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कविता : एक जज्बा है

हमारे पास रुतबा है न धन हैं न दौलत है
भले ही कुछ न हो जीने का एक जज्बा है

भले ही अंधेरा घना हो मगर ताज़ा हवा है
हमारे पास ज़िंदा रहने का एक वास्ता है

उनके पास फ़ुर्सत ही कहाँ रिश्ता निभाने की
मेरा कुछ लगता है मगर मुझ से ख़फ़ा है

सन्नाटा सा इस बस्ती में लगा है
फ़िजा बताती है कहीं पर कुछ हुआ है

खिड़की चौखट और दहलीज़ के पत्थर
इन आँखों से देखने को एक जरिया है

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज, 4 नवखुनिया, गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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