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कविता : हर घड़ी बस तुम्हें ही पुकारा करें

हर घड़ी बस तुम्हें ही पुकारा करें

देखकर आसमां में इशारा करें
अपने कंधे को अपना सहारा करें
जबसे तुम हो गए तबसे ऐसा हुआ
हर घड़ी बस तुम्हें ही पुकारा करें

मेरे मन की कलम नाम तेरा लिखे
मुझको चारों तरफ अक्स तेरा दिखे
तेरी यादों में हरपल है दिल ये मगन
तुझसे मिलने की है इसे बस लगन
कैसे तेरे बिना हम गुजारा करें
हर घड़ी बस तुम्हें ही पुकारा करें

दुआओं में असर कुछ भी आता नहीं
बिन तेरे अब नजर कुछ भी आता नहीं
ना फिकर कोई मुझको है अंजाम की
जपती माला ये सांसें तेरे नाम की
तेरे एहसास मुझको संवारा करें
हर घड़ी बस तुम्हें ही पुकारा करें

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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