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कविता : होता अगर मैं प्रभु

होता अगर मैं प्रभु

दुख दिनों के
सारे ही हर लेता।
भूखा न कोई
सो पाता।
उदर हर एक
का भर जाता।
होते वस्त्र
हर के
तन पे।
याचक कोई
न फिर बन पाता।
अस्मत न लूटती
किसी नारी की
न कहलाती
वो बेचारी।
खाई
अमीर गरीब
के बीच की
सारी मेँ
पाट देता।
रिश्ते सारे होते
ही अपने।
भाई से ही
भी किसी
खतिर न
लड पाता।
भाईचारे के
संग संग
भाव
वसुधैव कुटुम्ब
का भर देता।
अगर मैं प्रभु होता।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज, 4नवखुनिया, गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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