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कविता : झरना

झरना कितना मोहक
प्रकृति की पूरक
धरती लगे प्यारी
मानव इसके सम्मोहक।

ऊँचे नीचे चोटियाँ
धाटी में अठखेलियाँ
कल कल बहती झरनो की
पानी की मसकरियाँ।

मंत्र मुग्ध कर जाता
जो देखता ठहर जाता
सुन्दरता की अदभूत मिशाल
देखते ही उसी में खो जाता।

प्यारी प्यारी प्रकृति हमारी
जल ही जीवन रक्षक है
कल कल करते झरनो पर
संगीत कितनी सम्मोहक है।

आशुतोष
पटना बिहार

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