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कविता : कैसा खेल ?

बीन तुम जब भी बजी
नाग निकल आते हैं क्यूँ
बिलों से बाहर
लहर-लहर जाते
फुफकारते
आखिर क्या संबंध है
तुझमे और उनमें
समझ से परे
इसे प्रेम कहें
या आश्चर्य
एक ओर मधुर स्वर
दूसरी ओर तीक्ष्ण जहर
ये वेमेल,
कैसा खेल ?
सदियों से खेला जा रहा
कुछ समझ नहीं आरहा
इसका लाभ पर
मदारी उठा रहा
बच्चों का पेट पाल रहा

व्यग्र पाण्डे
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी, स.मा.
(राजस्थान) 322201

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