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कविता : कौन जाने

किसको किसका सहारा है जाने
या तुम जानो या हम ही जाने

जीने–जीने में फ़र्क होता है
ये हक़ीकत को कौन जाने।

सारी हमदर्दियाँ दिखावे की
यार लोगों का हौसला जाने

इसलिए आज तक नहीं देखे
ख्वाब होते हैं ख्वाब ही जाने

आप इसां नहीं फ़रिश्ता हैं
आप भूख प्यास क्या जाने

जिंदगी रूप कब दिखाती है
गर्दिशे वक्त तेरा क्या जाने

आप मेरी ज़ुबां न खुलवाएँ
सब किरदार आपका जाने

अर्ज करे रहें फर्ज अपना
आप क्या देंगे फ़ैसला जाने

हम तो रग रग से वाकिफ है
लोग भी आपका ज़ायका जाने

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज, 4नवखुनिया,
गांधी कॉलोनी, जैसलमेर

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