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कविता : कुछ तो बात है

कुछ तो बात है
बदलती हैं फिजां क्यों
कुछ तो बात है
चाँद नहीं दिखता क्यों
कुछ तो बात है
बस्ती में बदले आदमी क्यों
कुछ तो बात है
शीशा खुद को देख हैरान क्यो
कुछ तो बात है
लबों पे कड़वी बात क्यों
कुछ तो बात है
मुस्कान उन से रूठी क्यों
कुछ तो बात है
इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों
कुछ तो बात हैं
जल रहा एक नन्हा दिया क्यों
कुछ तो बात है
हर बार मेरा इम्तिहान क्यों
कुछ तो बात है
दोस्त भी दुश्मन क्यों
कुछ तो बात है
दिल इतना नादान क्यों
कुछ तो बात है

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज,4 नवखुनिया,गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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