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कविता : मैं गीत हूँ

मैं गीत हूँ

मैं गीत हूँ प्रेम का
तुम महसूस करो।
मै गीत हूँ मधुमास का
अगर यहां वास करो।
में गीत हूँ अपनी आस का
अपनी आरजू पूरी करो।
मेँ गीत हूँ अपनी प्यास का
अगर पीने की इच्छा करो।
मैं गीत हूँ अपने इतिहास का
अगर इसका गुणगान करो।
मैं गीत हूँ अपने विश्वास क
अगर तुम प्रयास करो।
मैं गीत हूँ अनुप्रास का
अगर इसका गुणगान करो।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज, 4 नवखुनिया, गांधी कॉलोनी,
जैसलमेर

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