न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

कविता : मर्म कवि का

कवि कभी रोता नही
वह केवल गाता है
दर्द सभी सीने में रखकर
वह जीवन पाता है।

जब दर्द उठता है
तब नव गीत बनता है
अश्रु धारा के संग संग
गीत नया बनता है।

हर्ष भी व उल्लास भी
यदाकदा ही मिलता है
दर्द के संग आह का बंधन
कवि केवल पाता है।।

कभी प्रातः बेला में
नई रचना करता है
कभी सांध्य काल में
गीत का ताना बुनता है।

चांदनी की कोमलता से
भाव वो झलकाता है
बादल की गर्जन से
ताव दिखलाता है।
बिना किसी उत्प्रेरक के
शब्द नही बन सकता है
कवि अपने हृदय में
बहुत कुछ संजो रखता है।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज, 4 नवखुनिया,गांधी कॉलोनी, जैसलमेर

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar