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कविता : प्यार के दिन सात हैं या सात दिन का प्यार

ऐसी आके चल गई पश्चिम की एक बयार
भूले सारी सभ्यताएं और संस्कार
ईश्वर का नाम पहले जिसको देते थे सभी
स्वार्थ-वासना में कहीं खो गया वो प्यार

युग में नए नया है प्रेमियों का भी अवतार
प्रेम का नहीं है , वासना का है बुखार
नाम पर अब प्यार के होने लगा ऐसा
कि बदनाम हो गया जहां में पवित्र प्यार

अनुयायी प्रेम की रही सदा ही ये संसार
प्रेम तो सदियों से है संसार का आधार
जबसे बंधा है सात दिन में तबसे लगता है
कि प्यार के दिन सात हैं या सात दिन का प्यार

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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