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कविता : रिश्ते

कैसें है ये रिश्ते
अनजाने
न जाने
न पहचाने
हर कोई
इन रिश्तों को
निभा नहीं रहा
है वह तो
केवल
ढो रहा है
हैं तो ये रिश्तें
बंधनों में
बंधे हुए पर
ये बंधन ही
कच्चे धागों का है
जब चाहा तोड़ दिया
और जब चाहा जोड़ दिया
इन्हें एक गांठ से
अपने स्वार्थों की
पूर्ति के लिए हम
इन रिश्तों क़ा
पालन करते है
मतलब निकल जाने
पर
रिश्तों को ताक में रखते हैं

मुकेश बिस्सा
जैसलमेर

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