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कविता : वजूद

हैं अपना भी कुछ वजूद
यूँ तो जीवन मे है कई परेशानियां
जूझते रहे हम भी
रहकर चुपचाप
हमेशा बोलते रहे
फिर अपने वजूद को
कुछ यूं पहचाना
कभी कभी ख़ुद
यूँही बदलते रहे दूसरों के लिए
दुसरे भी
देखकर हमे इतना
बदल गए कि
कोई बचा नहीं
उनका भी वजूद

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज,4 नवखुनिया
गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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