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कविता : यहां न अब कोई

रिश्तों में वो खट्टा मीठा स्वाद यहां न अब कोई
लोगों में अपनेपन की बुनियाद यहां न अब कोई

नये जमाने में सबलोग भले जुडे़ हों दुनिया से
पर अपनों से कर पाए संवाद यहां न अब कोई

लाचारी दुनियादारी और जाल न जाने कितने हैं
हर कोई है उलझा सा आजाद यहां न अब कोई

नर्क से बदतर लगती है बस्ती सारे मजलूमों की
कहां जाएं सुनता उनकी फरियाद यहां न अब कोई

थी बस्ती में जो रौनक सब आपके दम से ही तो थी
आप गए तो सूना है आबाद यहां न अब कोई

वो गए थे जब तब यादों ने मुझको बहुत सताया था
भूल चुका है दिल उनकी वो याद यहां न अब कोई

सजा सख्त हो जाए इतनी कि पापी थर थर कांपे
खुदगर्जी में कर पाए अपराध यहां न अब कोई

खुद का ख्याल खुद से ही रखने की आदत डालें
बुढा़पे में जो थामते थे औलाद यहां न अब कोई

इस सुंदर से बागवान को जाने किसकी नजर लगी
खिलते फूल उस तूफां के बाद यहां न अब कोई

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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