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‘कितने पाकिस्तान’ क़ब्रिस्तान और श्मशानों के बीच जीवन का संघर्ष है: कमलेश्वर

6 जनवरी जयंती विशेष

प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कमलेश्वर की आज जयंती है। वे अपनी लेखनी में एक ऐसी लोक अदालत का निर्माण करते हैं जिसमें हर उस मृत व्यक्ति पर मुक़दमा चलता है जिसने इस महान सभ्यता को तार-तार करने की कोशिश में घृणा के बीज बोए हैं। उनका मानना था कि यह क़ब्रिस्तान और श्मशानों के बीच जीवन का संघर्ष है।

प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कमलेश्वर

जीवन परिचयः
कमलेश्वर का पूरा नाम ‘कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना’ था। इनका जन्म 6 जनवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात् कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। कमलेश्वर बहुआयामी रचनाकार थे। उन्होंने सम्पादन क्षेत्र में भी एक प्रतिमान स्थापित किया। ‘नई कहानियों’ के अलावा ‘सारिका’, ‘कथा यात्रा’, ‘गंगा’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन तो किया ही ‘दैनिक भास्कर’ के राजस्थान अलंकरणों के प्रधान सम्पादक भी रहे। कश्मीर एवं अयोध्या आदि पर वृत्त चित्रों तथा दूरदर्शन के लिए ‘बन्द फ़ाइल’ एवं ‘जलता सवाल’ जैसे सामाजिक सरोकारों के वृत्त चित्रों का भी लेखन-निर्देशन और निर्माण किया।

पत्रकारिता से कहानी लेखन की ओर
कमलेश्वर साहित्यकार बाद में पत्रकार पहले थे। यही कारण है कि उनका हिंदी साहित्य पत्रकारिता की सुगंध से सुवासित हो उठती है। ‘विहान’ जैसी पत्रिका का 1954 में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें ‘नई कहानियाँ’ (1963-66), ‘सारिका’ (1967-78), ‘कथायात्रा’ (1978-79), ‘गंगा’ (1984-88) आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ हैं- ‘इंगित’ (1961-63) ‘श्रीवर्षा’ (1979-80)। हिंदी दैनिक ‘दैनिक जागरण'(1990-92) के भी वे संपादक रहे हैं। ‘दैनिक भास्कर’ से 1997 से वे लगातार जुड़े हैं। इस बीच जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार संभाला। सन 1980-82 तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे। कमलेश्वर का नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है। उनकी पहली कहानी 1948 में प्रकाशित हो चुकी थी परंतु ‘राजा निरबंसिया’ (1957) से वे रातों-रात एक बड़े कथाकार बन गए। कमलेश्वर ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में ‘मांस का दरिया,’ ‘नीली झील’, ‘तलाश’, ‘बयान’, ‘नागमणि’, ‘अपना एकांत’, ‘आसक्ति’, ‘ज़िंदा मुर्दे’, ‘जॉर्ज पंचम की नाक’, ‘मुर्दों की दुनिया’, ‘क़सबे का आदमी’ एवं ‘स्मारक’ आदि उल्लेखनीय हैं।

फिल्मों व दूरदर्शन से लगाव
फ़िल्म और टेलीविजन के लिए लेखन के क्षेत्र में भी कमलेश्वर को काफ़ी सफलता मिली है। उन्होंने सारा आकाश, आँधी, अमानुष और मौसम जैसी फ़िल्मों के अलावा ‘मि। नटवरलाल’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘राम बलराम’ जैसी फ़िल्मों सहित 99 हिंदी फ़िल्मों का लेखन किया है। कमलेश्वर भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें ‘चंद्रकांता’, ‘युग’, ‘बेताल पचीसी’, ‘आकाश गंगा’, ‘रेत पर लिखे नाम’ आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल ‘दर्पण’ भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम ‘पत्रिका’ की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म ‘पंद्रह अगस्त’ के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले ‘परिक्रमा’ में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर जी की थी। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक क्रियाशील, विविधतापूर्ण और मेधावी हिंदी लेखक थे।

अमर लेखनी ‘कितने पाकिस्तान’
भारतीय साहित्य अकादमी ने वर्ष 2003 के लिए कमलेश्वर के हिंदी उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को सम्मानित किया है। । हिन्दी में यह प्रथम उपन्यास है, जिसके अब तक पाँच वर्षों में, 2002 से 2008 तक ग्यारह संस्करण निकल चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह सभी संस्करण कुछ महीनों भीतर समाप्त होते रहे।
यह उपन्यास भारत-पाकिस्तान के बँटवारे और हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर आधारित है। ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास एक बड़ा और नए ढंग का उपन्यास है। उसमें एक ज़बर्दस्त संघर्ष है जो हर एक धर्मतावादी को सोचने पर मजबूर कर देता है। उपन्यास हिंदू, मुसलमान, सिख सबकी तरफ़ लगातार सवाल खड़े करता है कि मित्रता बड़ी है या शत्रुता? प्रेम बड़ा है या घृणा? अपने असाधारण इतिहास बोध के सहारे कमलेश्वर भारत की पाँच हजार साल लंबी परंपरा में इतिहास के उन तमाम विभाजनकारी रक्तरंजित और असह्य प्रसंगों को एक दूसरे में अपनी क़लम की करामात से इस क़दर मिलाकर रख देते हैं कि समग्र मानतावादी विमर्श उठ खड़ा होता है। दरअसल यह साधारण कहानी भर नहीं है। यह साहित्यकार की एक लोक अदालत है जिसमें हर उस मृत व्यक्ति पर मुक़दमा चलता है जिसने इस महान सभ्यता को तार-तार करने की कोशिश में घृणा के बीज बोए हैं। यह क़ब्रिस्तान और श्मशानों के बीच जीवन का संघर्ष है।

कमलेश्वर की लेखनी के अनमोल रत्न
कमलेश्वर कहानी लेखन के जादूगर थे। उन्होंने जॉर्ज पंचम की नाक, मांस का दरिया, इतने अच्छे दिन, कोहरा, कथा-प्रस्थान, मेरी प्रिय कहानियाँ शीर्षकीय कथा रचनाओं के माध्यम से न केवल हिंदी साहित्य में बल्कि अन्य भाषा साहित्य में विशेष पैठ जमाई है। उपन्यास के क्षेत्र में कितने पाकिस्तान शीर्षकीय रचना को कोई नहीं भूल सकता। इस रचना के लिए इन्हें कई पुरस्कार तथा प्रशस्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त एक सड़क सत्तावन गलियाँ, लौटे हुए मुसाफिर, डाक बंगला, समुद्र में खोया हुआ आदमी, तीसरा आदमी, काली आंधी, वही बात, आगामी अतीत, सुबह।।।।दोपहर।।।।शाम, रेगिस्तान आदि इनकी बेशकीमती रचनाएँ हैं।

सम्मान एवं पुरस्कार
कमलेश्वर कहानीकार तथा उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। किंतु‘कितने पाकिस्तान’ ने इन्हें सर्वाधिक ख्याति प्रदान की और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया। हिन्दी में यह प्रथम उपन्यास है, जिसके अब तक पाँच वर्षों में, 2002 से 2008 तक ग्यारह संस्करण निकल चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह सभी संस्करण कुछ महीनों भीतर समाप्त होते रहे। कमलेश्वर को उनकी रचनाधर्मिता के फलस्वरूप पर्याप्त सम्मान एवं पुरस्कार मिले। सन् 2003 में ‘कितने पाकिस्तान’ पर साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया। सन् 2006 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से राष्ट्रपति महोदय ने विभूषित किया। ऐसी महान हस्ती का निधन 27 जनवरी फरीदाबाद, हरियाणा में हुआ। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी रचनाएँ हमें सदैव सत्य प्रकाश की ओर मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]

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