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 कोविड-19 का कहर और भारत की विदेश नीति 

आज समूचा राष्ट्र अदृश्य विषाणु के खिलाफ जंग लड़ रहा है। कोरोना‌ की दूसरी वेव बेहद भयानक रूप से सामने आई है। दूसरी वेव सक्रिय होने से चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल है। इस बीच देश ऑक्सीजन की भारी किल्लत झेलने को मजबूर है। आज देश भर से स्वास्थ्य सेवाओं के खस्ताहाल होने की तस्वीरें उभरकर सामने आ रही हैं। आज ऑक्सीजन के लिए हम विदेशी राष्ट्रों पर निर्भर हो चुके हैं। कई देशों से ऑक्सीजन के आयातित होने की खबरें सामने आ रही हैं। देश में जहां कोरोना का कहर अपने चरम पर है, वहीं महंगाई अपना शिखर छू रही है। दरअसल, आज आम आदमी का जीना दूभर हो गया है।
भारत में कोरोना का कहर लगातार जारी है। आंकड़े बताते हैं कि बड़ी तेजी के साथ पिछले 20 दिनों के भीतर संक्रमित व्यक्तियों की संख्या दोगुनी हो गई हैं। ‘वर्ल्डोमीटर’ के मुताबिक भारत में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या 36 लाख को पार कर गई हैं। देश में 27 लाख से ज्यादा उपचाराधीन मरीज केवल 10 राज्यों से हैं। जबकि सक्रिय मामलों के हिसाब से महाराष्ट्र शिखर पर है, वहीं कर्नाटक दूसरे, केरल तीसरे, उत्तरप्रदेश चौथे और राजस्थान ऊपर से पांचवे पायदान पर है।
इस बीच भारत के हालात को लेकर यूनीसेफ ने इसे खतरे की घंटी कहा है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ)‌ ने भारत में मौजूदा हालात को चिंताजनक करार दिया है। यूनीसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरिटा फोर ने कहा कि भारत में कोविड-19 की भयानक स्थिति सभी के लिए चेतावनी है इसकी प्रतिध्वनि तब तक सुनाई देगी, जब तक भारत के लिए दुनिया मदद‌ के लिए कदम नहीं उठाएगी।
यह बात स्पष्ट है कि 17 वर्षों के अंतराल के बाद भारत किसी विदेशी सहायता को स्वीकार करने जा रहा है। इसके पीछे का मुख्य कारण कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर और इसके आक्रामक एवं भयानक परिणाम है। विदेशी सहायता भविष्य में भारत की विदेश नीति को बहुत हद तक प्रभावित करेगी। कोरोना‌ की दूसरी वेव सक्रिय होने से भारत में आज भयावह स्थिति सामने आई है, फलस्वरूप हमारी ऑक्सीजन की किल्लत दूर करने और स्वास्थ्य ढांचा कायम रखने के लिए विदेशी राष्ट्रों पर निर्भरता बढ़ी हैं। इससे भारत की विदेश नीति का प्रभावित होना‌ तय है।
कोरोना से निपटने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या भारत पहले की भांति क्षेत्रीय राजनीति पर अपना दबदबा बरकरार रख पाएगा। दक्षिण एशियाई देशों में भारत का नेतृत्व मुख्यत: तीन बातों पर निर्भर करता हैं। पहली, सहायता हेतु प्रदान की जाने वाली वस्तु एवं सेवाएं। दूसरी, राजनीति प्रभुत्व और तीसरी ऐतिहासिक संबंध। ऐसे में कोविड-19 के कारण पड़ोसी देशों को भौतिक रूप से प्रदत्त सहायता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और साथ ही इससे राजनीतिक प्रभुत्त्व को चुनौती मिलेगी। ऐसे में केवल ऐतिहासिक संबंधों के कारण भारत का क्षेत्रीय आधिपत्य बरकरार रख पाना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा।
कोरोना के कहर के बाद भारत के रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थानों में चीन की घुसपैठ बढ़ सकती है। चीन अपनी ‘चेकबुक कूटनीति’ के कारण पहले से ही भारत को भारतीय उपमहाद्वीप के अंदर भी चुनौती देता आया है। ऐसे में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर इस प्रक्रिया को और तेजी प्रदान कर सकती है। इस महामारी के कारण भौतिक शक्ति, शक्ति के संतुलन और राजनीतिक इच्छा शक्ति तीनों के संदर्भ में भारत, चीन का मुकाबला कर पाने में फिलहाल अक्षम नज़र आ रहा है।
‘क्वाड’ में भारत की स्थिति का प्रभावित होना लगभग तय है। कोविड-19 के कारण भारत की किसी भी महत्त्वाकांक्षी सैन्य खर्च या आधुनिकीकरण संबंधी योजना पर रोक लग सकती है। ऐसे में देश का ध्यान वैश्विक कूटनीति और क्षेत्रीय भू-राजनीति के स्थान पर अंदरूनी समस्याओं पर केंद्रित हो सकता है। सैन्य खर्चों में कमी और क्षेत्रीय भू-राजनीति पर कम ध्यान देने के कारण ‘क्वाड’ को मज़बूत बनाने में योगदान करने की भारत की क्षमता पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
इसके साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कूटनीति के प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण देश है, किंतु कोविड-19 के कारण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में असमर्थता और क्षेत्र में छोटे राष्ट्रों को लुभाने में चीन की रणनीति से अंततः शक्ति संतुलन चीन के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है।  कोविड-19 महामारी के कारण एक आर्थिक संकट के साथ-साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कमी आई है और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट तथा बेरोज़गारी में वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने भारत की रणनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को भी निस्संदेह सीमित किया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्त्व और भारत में कोविड-19 से संबंधित परेशानियों तथा संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए अमेरिका, चीन के साथ अपने आर्थिक संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास कर सकता है। कोविड-19 की दूसरी लहर से होने वाले नुकसान का अन्य संभावित परिणाम यह हो सकता है कि भारत, चीन के साथ उसके शर्तों पर संधि करने के लिये मज़बूर हो जाए। कोविड-19 के कारण भारत के लिये अमेरिका के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंधों का विरोध करना कठिन हो सकता है। ऐसे में कोरोना‌ का कहर भारत की भावी विदेश नीति को‌ बहुत हद तक प्रभावित करेगा।
हमारे देश भारत को कोरोना पर नियंत्रण के साथ-साथ अपने विदेशी नीति को लेकर विशेष रूप से सतर्क होने की जरूरत है। कोरोना के कहर ने हमारे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख दिया है। ऐसे में हमारे लिए आने वाला समय बेहद कष्टदायक हो सकता है। आज हमारी कोरोना से जंग जारी है। हम उम्मीद करते हैं हमारा देश यथाशक्ति के साथ यथाशीघ्र इस लड़ाई में विजयी होगा। हम यह भी उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार युद्ध स्तर पर प्रयास करके कोरोना से उपजी भयावह स्थिति को बहुत जल्द नियंत्रित करेगी।
अली खान
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