National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

क्योंकि बोझ नहीं बनना चाहता…

एक सिपाही था। वह अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए सीमा पर तैनात था। आए दिन दुश्मन देश से गोलीबारी के कारण माहौल गर्म हो चला था। किंतु इधर कुछ दिनों से माहौल शांत पड़ चुका था। उसने अपने अधिकारी से घर जाने की छुट्टी माँगी। अधिकारी ने स्वीकृति दे दी। घर निकलने से पहले उसने अपनी माँ को फोन कर यह सूचित किया कि वह घर आने वाला है। किंतु उसकी एक शर्त है। माँ ने जब पूछा कि शर्त क्या है तो उत्तर में उसने कहा कि मैं अपने एक मित्र के साथ आने वाला हूँ। वह भी सिपाही है। किंतु उसका दुनिया में कोई नहीं है। माँ ने मंजूरी देते हुए कहा कि वह अपने मित्र के साथ खुशी-खुशी आ सकता है। जितने दिन रहना चाहता है, रह सकता है।
यह सुन सिपाही की खुशी का ठिकाना न रहा। किंतु कुछ पल के लिए वह चुप रह गया। माँ को लगा कि उसका बेटा उससे कुछ छिपा रहा है। माँ के बहुत पूछने पर उसने बताया कि पिछले दिनों गोलीबारी में उसका एक मित्र घायल हो गया था। इस कारण उसका एक पैर काटना पड़ा। वह विकलांग हो चुका है। अब बताओ माँ क्या हम उसे रख सकते हैं? माँ तो पहले आनाकाना करने लगी। लेकिन अपने बेटे का दिल तोड़ना उसके बस की बात नहीं थी। माँ ने लंबी साँस लेते हुए कहा कि अपने साथ तो नहीं पास में कहीं हॉस्टल में रहने की व्यवस्था कर सकते हैं। बेटे को माँ की बात बुरी लगी। उसने माँ को मनाते हुए कहने लगा कि वह अपने मित्र के साथ घर में रहना चाहता है।
इस पर तुरंत माँ से फोन छीनते हुए पिता ने बेटे को समझाने का प्रयास किया। वह कहने लगे कि विकलांगों की देखभाल करना बड़ा मुश्किल काम है। विकलांग की सेवा करना किसी बोझ से कम नहीं है। इसलिए उसे हम अपने साथ नहीं रख सकते। इसलिए तुम अपना इरादा बदल दो। तुम अकेले आओ। उसकी देखभाल करना हमसे कहाँ होगा। उसे उसके हाल पर छोड़ दे। वह जैसे-तैसे रह लेगा। मेरे प्यारे तुम जल्दी से आ जाओ। हम सभी तुम्हारा कब से इंतजार कर रहे हैं।
पिता का इतना भर कहने की देरी थी कि बेटे ने फोन काट दिया। पिता ने कई बार हैलो-हैलो कहा। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कुछ दिन बाद उन्हें उनके बेटे के बारे में एक फोन आया। पता चला कि उनके लड़के ने एक ऊँचे भवन से कूदकर आत्महत्या कर ली। इतना सुनने भर की देरी थी कि माता-पिता तुरंत दौड़े-दौड़े घटनास्थल पहुँचे।
जैसे ही उन्होंने अपने बेटे का शव देखा, उनका कलेजा फट गया। उन्होंने देखा कि बेटा तो एक पैर से विकलांग है। मरने से पहले उसने एक पत्र लिखा था। पत्र इस प्रकार था-

पूज्य पिताजी,
मैं आप पर भार नहीं बनना चाहता। जिस दिन मैंने आपको फोन किया था उसके कुछ महीने पहले मैं घायल हो चुका था। उसी में मैंने अपना पैर गँवा दिया। मैंने डॉक्टरों और अधिकारियों को यह बात आप लोगों को बताने से मना कर दिया था। इसी घटना में मेरा मित्र भी घायल हुआ था। वह भी विकलांग हो चुका था। कितु जब आपने कहा कि विकलांगों की देखभाल करना भार के समान है, तो मैं आप लोगों पर बोझ नहीं बनना चाहता था। इसलिए इस दुनिया को छोड़कर जा रहा हूँ। हो सके तो क्षमा करें।
आपका पुत्र

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/glu8)

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar