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लालच की जीत या काम की? आप को फिर अप्रत्याशित बहुमत

दिल्ली है दिल वालों की। या फिर कहें कि दिल्ली है मूडी। जी हैं दिल्ली का मूड एक बार फिर अरविंद केजड़ीवाल की आम आदमी पार्टी के पक्ष में गया और इस बार भी दिल्ली के लोगों ने दिल खोलकर आप को बड़ी सौगात दे दी। मौका केजड़ीवाल के लिए और अधिक खास हो गया। मतगणना के दिन ही उनकी पत्नी का जन्मदिन होने पर उनकी खुशी दोगुनी हो गई। केजड़ीवाल और उनकी पत्नी ने तो दिल्ली के लोगों को इस तरह का तोहफा देने के लिए बहुत आभार जताया। केजड़ीवाल ने कहा कि दिल्ली वालों गजब कर दिया आप लोगों ने। लेकिन देश राजधानी में सभी पूर्वानुमानों को सत्यता देने वाले परिणामों ने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा कर दिया है। प्रश्न ये है कि केजड़ीवाल की पार्टी की जीत का आधार क्या माना जाए। लोगों के मध्य लालच की राजनीति अब घर करने लगी है। जहां पहले से ही तमिलनाडु और दक्षिण भारत के राज्यों में मतदाताओं को मंगलसूत्र और सोने-चांदी के गहनों के साथ काफी लालच दिए जाते रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर अब ये ट्रेंड एक दूसरे रूप में उत्तर भारत में भी चल पड़ा है। जी हां मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी अब राजनीति का खास हिस्सा हो चले हैं। 200 यूनिट बिजली फ्री देने का लालच और पानी फ्री देने का लालच अब मतदाताओं के मन को काफी लुभा रहा है। ये आपको दिल्ली के परिणाम में स्पष्ट नजर आ रहा है। हालांकि दिल्ली की इस सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक के माध्यम से हर पीड़ित रोगी की नब्ज का निशुल्क इलाज का प्रोजेक्ट लाया। इस प्रोजेक्ट ने आयुष्मान भारत योजना को भी फीका कर दिया है। वहीं शिक्षा के क्षेत्र में मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में हुए अभूतपूर्व बदलाव ने शिक्षा के स्तर को काफी ऊंचा किया है। शिक्षा के साथ ही अब खेलों के लिए भी दिल्ली के विद्यालयों में खास सुविधाएं मिलने लगी है। विद्यालयों की शक्ल-सूरत भी काफी बदल गई है। एक और महत्वपूर्ण बात महिला सुरक्षा की तो इस मामले में भी दिल्ली सरकार ने काफी बढ़िया काम किया है। दिल्ली में जगह-जगह गली-मोहल्लों में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जा रही है। लेकिन इस सब पर हो रहे खर्च का मूल्यांकन भी जरूरी है। सरकार को एक बार फिर भरोसे के साथ कमान मिली है। इस भरोसे को कायम रखना अब दिल्ली की आप सरकार के लिए चुनौती है। परिणाम में एक बार फिर आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस के हाथ खाली रह गए। ऐसे में लगातार 15 साल तक दिल्ली में काबिज रही शिला दीक्षित की कमी भी इस बार कांग्रेस को काफी खली। वहीं पार्टी स्तर पर चल रहे वाद-विवाद व पार्टी नेताओं के बेहूदा बयानों को भी इस शर्मनाक स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। क्या पार्टी इस स्थिति के बाद भी संगठन स्तर पर बड़े बदलाव की सोच रखेगी या फिर वही पुराना ढर्रा चलता रहेगा। सबसे पुरानी पार्टी जिसने 70 साल तक देश में राज किया। आज उसकी ये हालत क्यों हुई है, इसके कारणों की उचित समीक्षा जरूरी है। वहीं सरकार बनाने का दावा करने वाली भाजपा की हालत भी दिल्ली वालों ने बड़ी बुरी कर दी है। जहां शुरुआती ट्रेंड में भाजपा को 22 सीट मिलती दिख रही थी तो वहीं जैसे-जैसे परिणाम आते गए, वैसे-वैसे भाजपा की सीट घटती गई। आखिर में ये 7 सीट पर आकर सिमट गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की मेहनत पर पानी फिर गया। इसे भाजपा के खिलाफ नकारात्मक रूप से भी देखा जा सकता है। केन्द्र सरकार को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी। भाजपा को भी अब इस हार की समीक्षा करनी होगी। दिल्ली देश की राजधानी है और एक सन्देश यहां से पूरे देश में जाता है कि क्षेत्रीय पार्टियों का लगातार वर्चस्व बढ़ रहा है। नवीन पटनायक, नीतीश, ममता, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन आदि क्षेत्रीय दलों का सफल नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसे में लगातार बढ़ता क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व अब राष्ट्रीय पार्टियों के वर्चस्व को खत्म कर रहा है और अब कांग्रेस हो या भाजपा अब आगे किसी भी प्रकार का वादा करने से पहले सौ बार सोचेगी। ये जनता है जनाब इनका मूड भांपना बड़ा मुश्किल है। लेकिन इनका दिल जीतने के लिए अब बड़ी पार्टियों को अब लोगों के दिल से कनेक्ट होना होगा। सन्देश साफ है कि अब आप केवल अपनी बात ही मत कहो, आम आदमी की बात को दिल से सुनो और उनके दिल में फिर से जगह बनाओ।

चंद्रमौलि पचरंगिया
लेखक रसमुग्धा पत्रिका के सम्पादक हैं।

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