National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

अगस्त क्रांति की विरासत

भारतीय मुक्ति संग्राम के महामार्ग पर ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार एवं शोषण के खिलाफ जन-दबाव से कई बार तीखे मोड़ निर्मित हुए। ऐसी जगहों पर मुक्ति संग्राम नई जमीन तोड़कर अपने सामाजिक एवं क्षेत्रीय आधार को व्यापक करता है। स्वदेशी-बहिष्कार, असहयोग-आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन भारतीय मुक्ति संग्राम के सीधे मार्ग पर ऐसे ही चर्चित मोड़ हैं। भारत छोड़ो आंदोलन इनमें आखिरी महान संघर्ष था जो अपने आवेग एवं व्यापकता के कारण अगस्त क्रांति के भी कहलाता है। अगस्त क्रांति का आवाहन देशवासियों के आशा एवं अपेक्षाओं के केंद्र महात्मा गांधी ने ही किया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सभी सदस्यों को (गांधी सहित) भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव को पास करते ही नजर बंद कर नेतृत्व विहीन करने का प्रयास किया। किंतु भारतीय इतिहास की विलक्षण प्रवृत्ति के प्रदर्शन ने हुक्मरानों को हैरान कर दिया। ध्यातव्य है कि अवतारवाद के इस देश में जनता नेतृत्व में मुक्तिदाता की तलाश करती है और ऐसे महानायक के साथ ही उत्साह से खड़ी होती है। यहाँ नेतृत्व के संकट के कारण राष्ट्रीय प्रतिशोध एवं प्रतिरोध का बहुप्रतीक्षित स्वरूप परिलक्षित नहीं हो पाता। इसीलिए तुर्क-मुगल-अंग्रेजो की सदियों की गुलामी के दौर में हमें सतत राष्ट्रीय प्रतिरोध/बगावत देखने को नहीं मिलती है। अलग-अलग अंचलों में क्षेत्रीय नायकों के नेतृत्व में विदेशी हुक्मरानों को चुनौती दी गई। किंतु अगस्त क्रांति में बिना किसी महानायक के नेतृत्व के पूरे देश में जनता खुद ही अपनी मुख्तार बन गई जिस तरह छात्रों, किसानों महिलाओं ने पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपने आक्रोश को व्यक्त किया, उसने 1857 के बाद सबसे खतरनाक चुनौती पेश की। बलिया (उत्तर प्रदेश) तामलुक (बंगाल) तलचर (उड़ीसा) सोलापुर (महाराष्ट्र) धारवाड़ कर्नाटक) जैसे स्थानों पर तो हुकूमत के प्रतीक ध्वस्त कर स्वतंत्र सरकारों की स्थापना हो गई। अगस्त क्रांति/भारत छोड़ो आंदोलन अपने अभिव्यक्ति के स्तर पर गांधीवादी असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आंदोलनों की तरह अहिंसा की मर्यादा में नहीं रहा रेलवे लाइन एवं टेलीफोन लाइनों को उखाडना, थानों पर हमला एवं सेना, पुलिस के साथ सशस्त्र प्रतिरोध निश्चित रूप से इसे हिंसक शक्ल देते हैं। राष्ट्र की आजादी को अपनी आजादी समझने का जनता में बोध तथा उस आजादी को हासिल करने के लिए ताकतवर अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष करने का जज्बा निसंदेह जनसहभागिता एवं आजादी के लिए साझे प्रतिरोध जैसे तत्वों के कारण अगस्त क्रांति एक जीवंत लोकतांत्रिक विरासत का सृजन करती है जो आज भी हमें प्रेरित करती है।
भारत की अगस्त क्रांति युद्धरत विश्व (द्वितीय विश्वयुद्ध 1939-45) के कालखंड की घटना है। इस क्रांति के लिए परिवेश के सृजन एवं भारतीय नेतृत्व तथा जनता की मनोदशा बनाने में विश्व युद्ध की निर्णायक भूमिका थी। हिटलर द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ ही 1939 द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई। शुरू में यह ब्रिटेन और जर्मनी के मध्य युद्ध था किंतु 1941 जून में यह सही अर्थों में विश्वयुद्ध की शक्ल अख्तियार किया हिटलर ने सोवियत रूस पर आक्रमण कर दिया वहीं जापान ने पर्ल हर्बल प्रशांत महासागर पर हमला कर अमेरिका को भी युद्ध में खींच लिया। जाहिर है धुरी राष्ट्रों (बर्लिन-रोम-टोकियो) के बरक्स अब मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन-फ्रांस) में सोवियत रूस एवं अमेरिका जैसे विशाल देश भी शामिल हो गए। जापान के सैन्य शासकों ने पश्चिमी प्रशांत तट पर कब्जा कर चीन के अधिकांश हिस्सों पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। चतुर जापानियों ने ’एशिया एशिया वालों के लिए’ का नारा दिया और एशिया में ब्रिटिश उपनिवेशो में मुक्तिदाता के प्रचार के साथ विजय अभियान शुरू किया। सिंगापुर, मलाया एवं वर्मा पर ब्रिटिश सेना को खदेड़ कर जापानियों ने कब्जा कर लिया। अब भारत में अंग्रेजी राज की उपस्थिति जापानियों को आक्रमण का बहाना दे रही थी। इसलिए मित्र राष्ट्रों के नेताओं विशेषकर अमेरिकी राष्ट्रपति डी रूजवेल्ट, सोवियत संघ के शासक स्टालिन एवं चीन के शासक च्यान्ग काइशेक (जापान से युद्धरत) ने ब्रिटेन पर दबाव डाला कि वह भारत में अटलांटिक चार्टर लागू करें तथा भारतीयों का समर्थन हासिल करें। इसी बढ़ते दबाव के कारण चर्चिल ने क्रिप्स मिशन की घोषणा की। सर स्टैंडर्ड क्रिप्स स्वयं भारत आए। उन्होंने भारतीयों का समर्थन हासिल करने के लिए ठोस उत्तरदाई शासन के त्वरित हस्तांतरण भारतीयों के हाथ में करने तथा युद्ध उपरांत पूर्ण आजादी के मुद्दे पर चर्चा की किंतु भारत की प्रतिरक्षा के दायित्व को भारतीयों के हाथ देने के प्रश्न पर क्रिप्स वचन पूरा ना कर सके और उनका मिशन गतिरोध के साथ खत्म हो गया। अब कांग्रेस पर दबाव बढ़ता जा रहा था 5 जुलाई 1942 में महात्मा गांधी ने हरिजन पत्र में लिखा- ’अंग्रेजों भारत को जापानियों के लिए मत छोड़ो बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़कर जाओ।’ सिंगापुर, मलाया बर्मा में पराजित ब्रिटिश फौज के भारतीय सैनिकों को जापान के संरक्षण में रासबिहारी बोस एव मोहन सिंह ने आई एन ए (भारतीय राष्ट्रीय सेना) के रूप में गठित कर लिया। सुभाष चंद्र बोस द्वारा आईएनए का नेतृत्व हासिल करने से इसमें और आक्रामकता आई। अब भारत में अंग्रेजों की उपस्थिति निश्चित रूप से आईएनए के सहारे जापान को अवसर प्रदान कर रही थी। आइएनए द्वारा अंडमान निकोबार दीप समूह पर कब्जा एवं उत्तर पूर्व भारत पर हमले से यह धारणा मजबूत होने लगी। इन्हीं हालातों में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त क्रांति) का आह्वान किया।
अगस्त क्रांति का शंखनाद 8 अगस्त 1942 ग्वालियर टैंक कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव के पास होने के साथ ही आरंभ हो गया। अपने उद्बोधन में महात्मा गांधी ने जनता को ’करो या मरो’ के नारे के साथ पूर्ण आजादी के लिए संघर्ष का आवाहन किया। यद्यपि समूची कार्यसमिति को ब्रिटिश हुक्मरानों ने अहमदनगर फोर्ट में बंदी बना लिया और महात्मा गांधी को भी आगा खां पैलेस में कैद कर दिया गया। किंतु अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त 1942 को ग्वालियर टैंक मैदान में भारतीय झंडा फहरा कर क्रांति का सूत्रपात कर दिया। इसके बाद देशव्यापी स्वतः स्फूर्त विद्रोह प्रकट हुआ। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य जैसे जेपी, लोहिया, अच्युत पटवर्धन, बीजू पटनायक, सुचेता कृपलानी गुप्त रूप से जनता के बीच में रहकर आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उषा मेहता ने तो गुप्त रूप से कांग्रेस रेडियो का संचालन किया और अपने संदेशों में देशवासियों को क्रांति में शिरकत के लिए प्रेरित किया। ब्रिटिश सरकार ने कठोर सैन्य कार्रवाई से आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। 60000 से अधिक भारतीय जेल में डाल दिए गए, बंगाल की 73 वर्षीय मातंगिनी हजारा, असम की तरुण छात्रा कनकलाता बरूआ एवं पटना में सचिवालय पर भारतीय ध्वज फहराने के प्रयास में 7 छात्रों को पुलिस द्वारा गोली मारने की घटना बहुत चर्चित हुई। शासन के दमन की प्रतिक्रिया में किसानों, युवाओं ने रेलवे पटरी, टेलीफोन लाइन उखाड़ डाली, थानों पर हमला किया तथा देश के विभिन्न अंचलों स्वतंत्र सरकारों की स्थापना की। बलिया में चीतू पांडेय के नेतृत्व में, उड़ीसा के तलचर में बीजू पटनायक के नेतृत्व में, महाराष्ट्र के सतारा में वाई वी चैहान के नेतृत्व में तथा बंगाल के तामलुक मे जातीय सरकार स्थापित हुई। इस आंदोलन में सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र के किसानों ने बड़े उत्साह से शिरकत की। श्रमिकों ने भी औद्योगिक संस्थानों में हड़ताल कर आंदोलन का समर्थन किया। किंतु भारत की कम्युनिस्ट पार्टी जो विश्व युद्ध के प्रारंभ में इसे साम्राज्यवादी युद्ध कह कर अंग्रेजों के समर्थन का विरोध किया। वही हिटलर द्वारा सोवियत रूस पर आक्रमण करते ही कम्युनिस्ट पार्टी का रुख बदल गया और अब वह विश्व युद्ध को पीपुल वार कहने लगी और मित्र राष्ट्रों के समर्थन में बाधा ना आए इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन का भी विरोध करने लगी हद तो तब हो गई जब कामरेडो ने भारत छोड़ो आंदोलन को विफल करने के लिए अंग्रेजों के खुफिया दस्ते के रूप में काम किया। यही वह क्षण था, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय जनता की निगाहों में संदिग्ध हो गई।
अगस्त क्रांति का हासिल भले ही तात्कालिक तौर पर आमूल परिवर्तन करने वाला न दृष्टिगत हुआ हो। सरकार ने सैन्य बल से इस आन्दोलन को दबा दिया। किंतु इसका परिणाम गहरे स्तर पर क्रांतिकारी था। एक ओर इस आंदोलन ने भारतीय जनता कि वह मानसिक दशा निर्मित कर दी, जिसमें उसे पूर्ण आजादी से कम कुछ भी किसी भी कीमत पर कबूल नहीं था। वही दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत को यह एहसास हो गया कि नेतृत्व को कुचल देने अथवा सेफ्टीवाल बना लेने से भी भारत में राष्ट्रीयता को कुचलना अब असंभव है। अगस्त क्रांति ने राष्ट्रवाद की चेतना से अछूते सुदूरवर्ती अंचलों के किसान, जनजाति एवं भारतीय सेना को भी संबद्ध कर दिया। जाहिर है कि आईएनए की सेना में ब्रिटिश भारत के हिंदुस्तानी सिपाही ही शामिल थे। इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जख्मी ब्रिटेन की भारत पर शासन की मंशा का मोहभंग हो गया। युद्धोत्तर काल में कैबिनेट मिशन एवं प्रधानमंत्री एटली की भारत छोड़ने की घोषणा से अंग्रेजों का मोहभंग सर्वविदित हो जाता है। निसंदेह 15 अगस्त 1947 में हासिल भारत की आजादी के पीछे अगस्त क्रांति का योगदान निर्णायक था। भारत की आजादी अगस्त क्रान्ति की सबसे बड़ी देन है।

जय प्रकाश पाण्डेय

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar