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जो बीत गई सो बात गई…!

कोरोना का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोरोना से अब तक, जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, दुनिया में सवा दो लाख के करीब मौतें हो चुकींं हैं। अकेले अमेरिका में ही 74000 लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा रही है लेकिन इसी बीच अमेरिका वाले रायते पर रायता फैलाने में लगे हैं, ऐसा हमें ही नहीं आप लोगों को भी महसूस हो ही रहा होगा। कोई कोरोना को एंटी पैरासाइट दवा से दो दिनों में मारने का दावा कर रहे हैं तो कोई, अजी कोई कौन ?, वे हैं न अपने ट्रंप जी, वे इसे डिसइंफैक्टैंट, अजी वो ही अपना कीटनाशक क्लीनर, से मारने का दावा कर रहे हैं। हमें लगता है कि ट्रंप जी की बुद्धि कहीं से तेल शेल लेने चली गई है। लोग भी अच्छे बावले (पागल) हैं हमारी तरह, जो अपने नेताजी की बातों का आंख मूंदकर विश्वास कर रहे हैं। कोरोना से मरें ना मरें , डिस इंफैक्टैंट पीकर उनकी हालत जरूर खराब हो गई। अरे भाई ! रायता फैलाने का भी तो कोई तरीका होना चाहिए । हमें मालूम है कि रायता फैलाने का कोई तरीका नहीं होता, लेकिन भैय्या जी फिर भी हमारा मानना है कि थोड़ा बहुत तरीका तो होना ही चाहिए। हमें लगता है कि आजकल अमरीकी लोग भी हमारे लोगों की तरह झाड़ फूंक, टोना टोटका, लोकतंत्र शोकतंत्र में अंधविश्वास करने लगे हैं। हमारे तक तो यह बात ठीक लगती हैं लेकिन भैयाजी अमरीका बहुत एडवांस फडवांस देश है। पढ़े लिखे लोगों की भी मत मारी गई लगती है। अरे भैया ! तुम नींबू पानी पीओ, शरबत पीओ, छाछ लस्सी पीओ,चाय साय,कॉफी वॉफी पीओ,पानी पीओ लेकिन भैय्या जी ये डिस इंफैक्टैंट भी भला कोई पीने सीने की चीज है ? ये डिस इंफैक्टैंट पीने से पहले कुछ आगा-पीछा तो देखा होता ? माना कि कोरोना डेढ़ ग्राम से भी कम वजन का है, लेकिन भैय्या जी इसने अभी तक विश्व के करीबन तीस लाख लोगों को बीमार सीमार कर दिया है और अभी आई.आर.सी( इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी) ने चेताया है कि कोरोना से एक अरब तक लोग संक्रमित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में भैय्या जी हम तो कहते हैं, थोड़ा इत्मीनान से काम लो, हड़बड़ाहट न फैलाओ और न ही हड़बड़ाहट में कोई काम करो। वैसे, ये जो रायता सायता फैलता है न, यह सब हड़बड़ाहट में ही अधिक फैलता है। अब डिस इंफैक्टैंट की सलाह ट्रंप जी ने दी है या वहां के मीडिया ने यह रायता फैलाया है, यह बात तो हमें पता नहीं है लेकिन हम तो यह बातें सातें मीडिया में ही देखकर, सुनकर बोल रहे हैं जी। हमें लगता है कि ये बातें सही है या गलत,इस बात का पता हमें जांच के चश्मे से ही लग सकता है लेकिन जांच का चश्मा पावरफुल होना चाहिए। बिना पावरफुल चश्मे के इसका खुलासा नहीं हो सकता है जी। अब बात चश्मे की चल ही पड़ी है तो चश्मा दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है।आजकल, दुनिया में बहुत प्रकार के चश्मे आ गए हैं। मसलन नजर का चश्मा, काला चश्मा, रंगीन चश्मा, नजदीक देखने व दूर देखने का चश्मा वगैरह वगैरह। वैसे इनके अलावा भी अनेक प्रकार के चश्मों की वैरायटी उपलब्ध हैं। पूर्वाग्रह का चश्मा, आत्मा का चश्मा भी उनमें से एक हैं। अब चीन कह रहा है कि उसके देश में बने उत्पादों को “पूर्वाग्रह के चश्मे” से न देखा जाए। कोरोना को लेकर भी अमरीका पूर्वाग्रह के चश्मे से चीन को बार बार देख रहा है और बार बार जांच की मांग कर रहा है कि आखिर यह कोरोना फोरोना आया कहाँ से हैं ? इसका अवतार चीनी लैब में हुआ या चमगादड़ों व पेंगोलिन से यह अवतरित हुआ ? चीन के एक अधिकारी ने भारत भेजी गई रैपिड जांच किटों व अन्य निर्यात किए जाने वाले उत्पादों को लेकर यह बयान दिया है कि उत्पादों की गुणवत्ता उनके देश अर्थात् चीन की पहली प्राथमिकता है और उनके देश के उत्पादों पर कुछ लोगों द्वारा पूर्वाग्रह के कारण त्रुटिपूर्ण का तमगा लगाना अत्यंत गैर जिम्मेदाराना एवं अनुचित है। अब ,चीन के अधिकारी ने जैसे ही यह बयान दिया तो हमारे लंगोटिया रामलुभाया जी यकायक उछल पड़े और बोले-” अपनी मां को डाकण(डाकन/डायन) कोई नहीं बताता है जी।” अजी, हम तो चीन को यह कहना चाहते हैं कि हमारे देश के चिकित्सकों ने रैपिड टैस्टिंग किट्स को उनकी विशेषता के अनुरूप ही उनका प्रयोग किया है। परीक्षण के निष्कर्ष में एक दो स्थानों पर अंतर आ सकता है लेकिन यदि आपकी(चीन की) पाजीटिव मरीज को भी नेगेटिव बताने लगे तो बेचारे चिकित्सक इसमें क्या करेंगे ? हमारे खासमखास मित्र तोताराम जी का भी यही कहना है कि –

“जो बीत गई सो बात गई ! ”

तोताराम जी कहते हैं कि ऐ चीन ! तुमने पहले कोरोना को लेकर पूरे विश्व में रायता फैलाया और अब तुम अपनी रैपिड टैस्टिंग किट्स को लेकर रायते पर रायता फैला रहे हो। तुम्हें थोड़ी बहुत भी सुध-बुध नहीं है क्या ? पहले जो तुमने गलती कर दी वह धीरे धीरे बीत ही जायेगी, लेकिन तुम हो कि अभी भी गलती पर गलती किए जा रहे हो और चोरी करके ऊपर से सीनाजोरी भी किए जा रहे हो। भैय्या जी ऐसा कब तक चलेगा ? तुम अपनी आदतों से कब बाज आओगे ? तुम ड्रैगन हो और ड्रैगन ही कहलाओगे और तुम्हें तो पता है कि ड्रैगन कैसा होता है, उसका स्वभाव कैसा होता है ? तुम भली भांति अपने स्वभाव से परिचित हो। पूर्वाग्रह का चश्मा तुम्हें बदलने की जरूरत है, हमें नहीं क्योंकि हमारा देश पूर्वाग्रह से ग्रसित चश्मे नहीं पहनता।

धार्विक नमन, “शौर्य”,पटियाला, पंजाब
स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार

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