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झूठ के पाँव और पंख

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। शायद आपने भी पढ़ी होगी। वही जिसमें एक गड़रिया भेड़ों को चराता था। रह-रहकर गाँव वालों से मजाक करता था। शेर आया, शेर आया। और गाँव वाले जब गड़रिया की जान बचाने उसके पास जाते तो वह खूब जोर से हँस देता था। गाँव वाले अपना इतना सा मुँह लेकर लौट आते थे। फिर एक दिन सच में शेर आया। किंतु उस दिन गाँव वालों ने गड़रिये की सहायता नहीं की। वे जानते थे कि गड़रिया फिर से उनके साथ मजाक कर रहा है। किंतु इस बार सच में शेर आया और गड़रिये को मारकर खा गया। कुल मिलाकर इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि बार-बार झूठ सुनने और देखने के बाद यदि एकाध बार सच कह भी दिया जाए तो वह झूठ ही लगता है। यही हुआ था गड़रिये के साथ।

आज वह गड़रिया हम हैं। क्या आप जानते हैं कि आज हम गड़रिया बनकर शेर आया, शेर आया जैसी कौनसी झूठी अफवाहें सोशल मीडिया में फैला रहे हैं? वे हैं- कई लाशों वाली इटली शहर की तस्वीर, रु. 498/- का जिओ का फ्री रीचार्ज, कई लोगों का जमीन पर पडे सहायता के लिए चिल्लाना, डॉ. रमेश गुप्ता की किताब जंतु विज्ञान में कोरोना का इलाज, मेदांता हास्पिटल के डॉ. नरेश त्रेहान की नेशनल इमर्जेंसी की अपील, एक दंपत्ति की तस्वीर जो 134 पीड़ितों का इलाज करने के बाद संक्रमण का शिकार होना, कोविड-19 कोरोना की दवा, कोरोना वायरस का जीवन 12 घंटे तक बताना, रूस में 500 शेर सड़कों वाली तस्वीर, इटली की ताबूत वाली तस्वीर आदि-आदि। ये अफवाहें यदि कोई अनपढ़ या नासमझ फैलाता तो उसकी भूल-चूक को माफ की जा सकती थी। किंतु यह कारनामा पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवियों की देन है।

संचार क्रांति से दुनिया मुट्ठी में तो जरूर आ गयी है लेकिन हम मुट्ठी से बाहर हो गए हैं। आज बड़ी आसानी से सिरिया की कोई फोटो भेज कर उसे भारत में हुए ट्रेन दुर्घटना से जोड़ दिया जाता है। कभी और कहीं की फोटो भेज कर कहा जाता है इस बच्ची के दिल में छेद है और इसके प्रत्येक शेयर पर इसके ऑपरेशन के लिए कुछ खास रकम मिलेगी, बता दिया जाता है। किसी हैकर द्वारा कोई लिंक आसानी से सोशल मीडिया में चला दिया जाता है और कहा जाता है इस लिंक पर जाने पर आपके मोबाइल नेटवर्क पर 500–1000 रूपए का रिचार्ज हो जायेगा। कभी लता मंगेशकर, तो कभी अमिताभ बच्चन को इंटरनेट पर झूठी खबर फैला का मार तक दिया जाता है। इतना ही नहीं, कई बार सोशल मीडिया में ऐसी तस्वीरें चक्कर काटती नजर आती है, जिसमें यह बताया जाता है कि किसी का बच्चा या फिर प्रमाण पत्र गुम हो गए हैं। आगे चलकर पता चलता है कि बच्चा तो कभी का मिल गया, लेकिन जब-जब वह स्कूल के लिए बैग लेकर निकलता है तब-तब उसे यह कहकर घर लौटा दिया जाता है कि गुम हुआ बच्चा यही है। शायद वह बच्चा अब कभी स्कूल जा पाए!

छोटे मियाँ तो छोटे मियाँ बड़े मियाँ सुभानल्लाह की तर्ज पर सोशल मीडिया ने अफवाहें फैलाने में क्या कसर छोड़ दी थी कि जिसे पूरा करने के लिए इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं। यही कारण है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को आड़े हाथों लिया। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी खबरों को लेकर मीडिया को निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर प्रवासी मजदूरों के पलायन के पीछे फर्जी खबरों पर चिंता जताते हुए मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया) को अपनी जिम्मेदारी सही तरह से निभाने, घबराहट पैदा करने वाले और असत्यापित समाचारों के प्रसार पर रोक लगाने के लिए निर्देश जारी किया है।

इसलिए हमें इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि जिस तरह चॉकपीस से ज्ञान और विज्ञान की बातें लिखकर सिखायी जा सकती हैं ठीक उसी तरह उसी चॉकपीस से बुरा भी सिखाया जा सकता है। अब यह हम पर है कि हम किस तरह से इसका उपयोग करते हैं क्योंकि हर जगह अच्छाई के साथ बुराई भी देखने को मिलेगी। शुक्र मनाइए कि भगवान ने हमें अच्छे-बुरे, सच-झूठ, न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म की सोच-समझ दी है। इसके बावजूद यदि हम गलती पर गलती करते हैं तो हम में और जानवर में क्या फर्क रह जाएगा? झूठ के पाँव और पंख के आगे अपंग सच बेबस है।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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