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हो रही है पास कहीं फेल जिंदगी

है हार जीत की रही खेल जिंदगी

चढ़ते-उतरते नित हम सब यात्री
दौड़ रही पटरियों पर रेल जिंदगी

पैर रुके मुंह ब॔धे है स्तब्ध आदमी
सोच रहा हुई कैसे जेल जिंदगी

अंधड़ों से लड़के भी बुझ नहीं रहे
दीप- दीप भर रही है तेल जिंदगी

मौत रचे जा रही षड़यंत्र निरंतर
फिर भी दुनिया से किए मेल जिंदगी

 

डॉ एम डी सिंह

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