न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

जिंदगी की चादर और सांसों के धागे

अरी सुनती हो माधुरी! वो सुनीता है न! वही जिसकी दो साल पहले चंडीगढ़ में शादी हुई थी। हाँ-हाँ वही! एक महीने पहले उसके पति का देहांत हो गया। कैसे? सुनीता तो टीबी की बीमारी बता रही थी। इतना कहते हुए मीना की आँखें नम हो गयीं। एक हाथ से मोबाइल संभालते और दूसरे हाथ से आँखों के कोरों पर जमे आँसू पोछ रही थी। तभी घर की घंटी बजी। मीना ने माधुरी से बाद में बात करने का वादा कर फोन काट दिया।

दरवाजा खोला तो आश्चर्य से मीना की आँखें फटी की फटी रह गयी। देखा तो सुनीता खड़ी थी। अरी सुनीता! तू और यहाँ? सब ठीक तो है न? मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ जो घर आयी सहेली को अंदर बुलाने की जगह खड़ी-खड़ी बात कर रही हूँ। आओ-आओ अंदर आओ। इतना कहते हुए मीना सुनीता को हॉल में बैठने के लिए कहा। गोद में एक साल का बच्चा था। आवभगत करने के लिए सुनीता के लिए चाय और बच्चे के लिए दूध लाने मीना रसोई में चली गयी। चाय और दूध लेकर लौटी। दोनों बातें करने लगे।

तुम्हारे पति के बारे में जानकर बड़ा दुख हुआ। छोटी सी उमर में तुम पर इतना बड़ा दुख का पहाड़ टूट पड़ा। भगवान ने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया। ऊपरवाला भी कितना निर्दयी है। तुम्हारा न सही कम से कम बच्चे के बारे में तो सोचा होता। बाप का साया न होना सर से आसमान छीन लेने के बराबर है। इतना कहते-कहते मीना फफक-फफक कर रोने लगी।

सुनीता मीना के आँसू पोंछने लगी। कहने लगी – भगवान का लिखा कौन मिटा सकता है? मेरे भाग्य में यही लिखा था। वैसे अगले रविवार घर पर एक छोटा सा कार्यक्रम है। मेरी रवि से शादी होने वाली है। तुम अपने पति के साथ जरूर आना। इतना सुनना था कि मीना को मानो साँप सूँघ गया। मुँह बड़ा करते हुए – तुम फिर से शादी करने जा रही हो? और यह रवि कौन है?

सुनीता ने धीरे से कहा – रवि कोई और नहीं अपना क्लासमेट है। वह मुझे नवीं कक्षा से ही प्यार करता था। उसने मुझे प्रपोज भी किया था। मैंने उसे यह कहते हुए मना कर दिया था कि हमारे घर में पता चलेगा तो वे मुझे मार डालेंगे। जबकि सच्चाई यह थी कि मैं भी उससे बहुत प्यार करती थी। लेकिन उसके साथ भागकर जाने की हिम्मत नहीं हुई। घरवालों ने मेरा रिश्ता महेश से कर दिया। यह सोचकर कि वह सुशील और खूब पैसे वाला है। लेकिन बाद में पता चला कि वह कर्जे में डूबा हुआ है। उसे कई बुरी लत है। आखिरकार उसके कर्जे चुकाने के लिए मुझे नौकरी करनी पड़ी। इस बीच पति को टीबी हो गया। मेरे पास….

सुनीता और कुछ कहती मीना ने उसे बाहों में भर लिया। उसे चुप कराने लगी। उसने सुनीता से कहा – चलो तुमने जो भी किया अच्छा किया। हम शादी में जरूर आयेंगे। कहते हुए सुनीता को विदा कर दिया। सुनीता के जाने के बाद उसने तुरंत माधुरी को फोन मिलाया और सारा किस्सा उगल डाला। साथ ही सुनीता पर तंज कसते हुए कहने लगी – हो न हो सुनीता ने ही रवि के साथ मिलकर अपने पति का काम तमाम किया होगा। पुराने आशिक के लिए कोई भला इतनी नीच हरकत भी कर सकता है। मुझे तो शक है कि यह लड़का भी कहीं रवि का तो नहीं। जमाना बड़ा खराब है। इतना कहते हुए फोन रख दिया।

अगले रविवार वह अपने पति के साथ मिलकर सुनीता के विवाह में पहुँची। छोटा सा कार्यक्रम था। शादी शुरु होने में कुछ घंटे बाकी थे कि वह वहाँ आयी अपनी सहेलियों से इधर-उधर की बातें करने लगी। बातों-बातों में पता लगा कि सुनीता खुद कैंसर की शिकार है। उसकी बीमारी अडवांस स्टेज में है। बड़ी मुश्किल से दो महीने जिएगी। पहले महेश और अब सुनीता के इलाज के लिए रवि ने अपनी सारी संपत्ति दाव पर लगा दी। फिर भी उसे खुशी इस बात की थी कि सुनीता के संग जीने के लिए दो महीने तो मिलेंगे। दोनों की शादी हो गई। दो महीनों बाद सुनीता इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए चल बसी।

यह घटना घटे आज छब्बीस बरस बीत चुके हैं। रवि ने अपना नाम बदलकर महेश कर लिया और अपनी सुनीता की निशानी को अपने लड़के से भी ज्यादा चाहा। लड़का दूसरे शहर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। शादी हो चुकी है। उसका एक बेटा भी है। इथर रवि अपनी छोटी सी कुटिया सुनीता सदन में जीवन की अंतिम सांसे गिन रहा है।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar