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माँ की लेखनी

जन्म हुआ जब उसका घर में
एक रौनक सी छाई थी ।

एक कोमल सी नन्ही परी इस
जग में आई थी ।

उसकी किलकरी से आँगन में
फूलो की खुश्बू महकती थी ।

सब के होठों पर प्यारी सी हँसी बिखरती थी
उसके पाव की पायल जब छनकती थी

उज्जवल भविष्य के सपने लेकर
जब वो उड़ने निकली ..

हैवानों की बुरी नजर उसको ताकती थी
दरिंदो की हरकत से अनजान वो
सड़को पर निकली थी ।

जानवर समझ कर रौंदा उसका आत्मसम्मान
बदन के कपड़े किये तार – तार टूटा सब अरमान

मदद को उसने कई आवाज लगाई थी
दम तोड़ दिया उसके सपनों ने
जिसकी वो राज दुलारी थी ।।

गुलशन पाण्डेय
मधेपुरा बिहार

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