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मांओं की सूनी गोद की दास्तां बयां करते मौत के ये आंकड़े

सवाल ये उठता है कि आखिर विश्व गुरू बनने की दहलीज पर खड़ा भारत यानी न्यू इंडिया भी कभी बिहार के मुजफ्फरपुर मे ,कभी यूपी के गोरखपुर मे,कभी राजकोट मे और कभी राजस्थान के कोटा जैसे शहर मे मासूम बच्चों को बचाने पाने मे कामयाब क्यों नही हो रहा है?बदलते भारत मे भी मासूम बच्चों की मौत को एक गंभीर मामला मानते हुए इसपर कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए।स्वास्थ्य जैसी गंभीर चीज को कैसे सिरे से खारिज कर मासूम बच्चों की मौतों को आंकड़ों और बयानों के खेल मे उलझाया जा सकता है।खुद सरकारी रिपोर्ट कहती है कि कोटा के अस्पताल में बच्चे सर्दी के कारण मरते रहे और यहां पर जीवन रक्षक उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में नहीं थे।नवजात शिशुओं के शरीर का तापमान 36.5 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए,इसलिए उन्हें वार्मरों पर रखा गया,जहां उनका तापमान सामान्य रहता है।लेकिन अस्पताल में काम कर रहे वार्मर की कमी होती गई,बच्चों के शरीर के तापमान में भी गिरावट जारी रही और माओं कि गोद सूनी होती गयी।अस्पतालों के बाहर नेताओं,मंत्रियों और अफसरों के घड़ियाली आंसू इस बात की गवाही है़ कि देश मे आज भी अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं और पोषित आहार की पहुंच सीमित है और राज्यों में डॉक्टरों की बड़ी कमी है।बच्चों की मौतों का दंश झेल चुके यूपी,बिहार और राजस्थान मे एक हजार लोगो पर एक डाक्टर का मानक अभी बहुत पीछे है।पुराने भारत और न्यू इंडिया मे कैसे फर्क किया जायेगा।
यहां ये भी बताते चलें कि 2019 में भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों में 30.924 है जो अपने आप में एक बड़ी संख्या है।इस बात को हरगिज नकारा नहीं जा सकता कि नेताओं की उदासीनता भी शिशु मृत्यु दर में ठहराव का एक बड़ा कारण है।वोटों के तवे पर रोटियां सेक रहे नेताओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं कोई बड़ा मुद्दा नहीं हैं।कुछ समय पहले जारी ग्लोबल चाइल्डहुट रिपोर्ट में बताया गया है कि शिशु मृत्यु दर में दुनियाभर में भारत की रैंकिंग बेहद खराब है। कुल 176 देशों में भारत का नंबर 113वें पायदान पर आता है। हलांकि पिछले कुछ सालों में भारत की शिशु मृत्यु दर कम जरूर हुई है।पिछले 11 सालों में भारत की शिशु मृत्यु दर 42 प्रतिशत कम हुई है। जहां साल 2006 के मुकाबले शिशु मृत्यु दर 57 से घटकर अब 33 हो चुकी है। लेकिन भारत अभी भी ग्लोबल एवरेज से काफी नीचे है।।यही नही भारत की हालत अभी भी अपने पड़ोसी देशों से भी काफी खराब है। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान और म्यांमार को छोड़कर बाकी सभी पड़ोसी देशों में भारत के मुकाबले शिशु मृत्यु दर काफी कम है।यानी एक हजार जन्मे बच्चों मे से त्रीलंका मे 8,नेपाल मे 28,बंग्लादेश मे 27 और चीन मे केवल की 8 बच्चों की मौत होती है जो हमारे देश से कम है।अगर राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश,असम और अरूणचल प्रदेश मे एक हजार जन्मे बच्चों मे से लगभग उतने बच्चे अपना दूसरा-तीसरा जन्म दिन नही मना पाते जितने अफ्रीका के देश नीगर के बच्चे नही मना पाते है।ये भी बताते चले कि नीगर का 80 प्रतिशत हिस्सा सहारा रेगिस्तान का है। आप दुनिया के किसी भी देश, संस्कृति या जीव को ले लीजिये, हर परिवार के लिए बच्चे के जन्म सबसे सुखद क्षण होता है, जो किसी भी त्यौहार से कम नहीं होता । पर सबसे बड़े दुःख की बात है कि यह खुशी के लम्हे कई परिवारों के लिए लम्बे समय तक कायम नही रहने पाते हैं।अपने बच्चों का मातम मनाने वाली माताओं और पिताओं से पूछियेगा तो शायद वो यही कहें कि बदलते भारत मे विकास के दावे खोखले और कागजी हैं।एक अनुमान के मुताबिक 2020 के पहले दिन देश में 67 हजार से अधिक बच्चों का जन्म हुआ है।पुराने आंकड़े बताते हैं कि इसमें से सैकड़ों बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन मनाने के पहले ही दम तोड़ देंगे।अगर ये सत्य है कि एक दिन में सबसे ज्यादा बच्चे पैदा होने के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे है।तो ये भी सच है कि मरने वाला हर छठा बच्चा भी भारत का होता है।यूनिसेफ के अनुसार हर 53 सेकेंड में एक नवजात बच्चे की मौत हो जाती है। इसकी एक बानगी राजस्थान के कोटा में देखने को मिली हैं जहां पिछले एक महीने में 100 से अधिक बच्चों की मौत एक अस्पताल में हुई है।
इतना बड़ा आंकड़ा होने के बावजूद यह सरकारी तंत्र के लिए कोई नई बात नहीं है।अस्पताल में शिशुओं की मौत की मुख्य वजह सुविधाओं का अभाव है। कोटा का जेके लोन अस्पताल इससे अलग नहीं है आसपास के क्षेत्र का प्रमुख अस्पताल होने के बावजूद वैसी सुविधाएं नहीं है जो भर्ती होने वाले सभी शिशुओं को दी जा सके।शायद यही वजह है कि इस अस्पताल मे मासूमों की जिंदगी हमेशा सलीब पर टंगी रहती है।सरकारी जांच रपट कहती है कि अस्पताल के 77 प्रतिशत वार्मर काम नहीं कर रहे थे।चार बच्चों पर एक नर्सिंग स्टाफ होना चाहिए था,लेकिन 13 बच्चों पर एक स्टाफ था।यानि कि गंभीर बच्चों की देखरेख हो ही नहीं सकती थी।यही नही 28 में से 22 नेबुलाइजर डिसफंक्शनल मिले और 111 में से 81 जलसेक (इनफ्यूजन) पंप काम नहीं कर रहे थे।जबकि पैरा मॉनिटर और पल्स ऑक्सीमेटर्स की हालत भी खस्ता थी।रिपोर्ट में बताया है कि हाइपोथर्मिया यानी शरीर का तापमान असंतुलित हो जाना के कारण बच्चों की मौत हुई है। अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी इसकी वजह हो सकती है।पिछले आंकड़े भी अस्पताल की अव्यवस्था और सुविधाओं कि कमी की कहानी कह रहे हे।पिछले पांच साल मे कोटा के जेके लोन अस्पताल मे इलाज के लिए 84832 बच्चे भर्ती किये गये जिसमे से 5683 मासूम अस्पताल से जिंदा नही जा सके।ये केवल आंकड़े नही,उन माओं की कहानी है जिनकी गोद व्यवस्था की मार से सूनी हो गयी।
अस्पताल के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि इस अस्पताल में अधिकतर गंभीर शिशुओं को लाया जाता है, इसके बाद भी उनमें से अधिकतर को बचा लिया जाता है।जबकि राजस्थान सरकसर का कहना है कि इसकी व्यवस्था के लिए काम जारी है।ये भी एक कारण है कि अस्पताल में क्षमता से अधिक बच्चों के भर्ती होने से भी परेशानी होती है। एक बेड पर दो-तीन बच्चों को रखे जाने से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है।वैसे मानवीय आधार पर कोई बच्चा गंभीर स्थिति में अस्पताल में आ जाता है तो उसे लौटाया नहीं जा सकता और उपलब्ध संसाधनों में ही उसका इलाज होता है।उधर गुजरात के राजकोट में भी मासूमों की मौत की घटना सामने आ गई है।बताया जा रहा है कि राजकोट के एक सरकारी अस्पताल में पिछले एक महीने यानी दिसंबर में 134 बच्चों की मौत हुई है।जोधपुर से भी बच्चों के मरने की ऐसी ही खबरें आयी हें। हालांकि बच्चों की मौत की वजह कुपोषण, जन्म से ही बीमारी, वक्त से पहले जन्म, मां का खुद कुपोषित होना बताया जा रहा है।ऐसा नही है कि देश के बाकी जिलों के सिविल अस्पतालों कि हालत बहुत अच्छी है।ये जानकारियां बाहर आ गयी इस लिए सुर्खियां बन गयी।

संयुक्त राष्ट्र के शिशु मृत्युदर आंकलन के लिए बाल मृत्युदर अनुमान एजेंसी यानी यूएनआईजीएमई की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में औसतन हर दो मिनट में तीन नवजातों की मौत हो जाती है।इसका कारण पानी, स्वच्छता, उचित पोषाहार या बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी बतायी जाती है। युनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर बच्चा पैदा होने के बाद एक महीने तक जीवित रहता है तो 5 साल की आयु तक पहुंचने से पहले निमोनिया और डायरिया उसके जीवन पर खतरा पैदा करते हैं।बालरोग विशेषज्ञ का कहना है कि छोटे बच्चों में निमोनिया की वजहें कुपोषण, जन्म के समय कम वजन, उचित स्तनपान न मिलना है।अब देखिये निमोनिया के कारण होने वाली मौत और गरीबी के बीच भी मजबूत संबंध है। स्वच्छ पेयजल का अभाव, पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल की कमी और पोषण की कमी व भीतरी वायु प्रदूषण निमोनिया के खतरे को बढ़ा देता है।ऐसा नही है कि शिशु स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भारत प्रगति नही कर रहा है। लेकिन यह प्रगति इतनी नहीं कि हजारों बच्चों को मौत से बचाया जा सके। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश भर में 2016 में साढ़े आठ लाख से अधिक नवजात बच्चों की मौत हो गयी थी, जो 2017 में घटकर लगभग आठ लाख रह गयी। यह आंकड़ा पिछले पांच वर्ष में सबसे कम है,लेकिन दुनिया के किसी भी देश से अधिक है!
अगर इसमें उल्लेखनीय सुधार करना है तो डॉक्टरों की कमी को दूर करने साथ ही मातृत्व स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा।अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं पर न तो संसद में लंबी बहस हो पाती है और न ही सरकारें कुछ बोलने को तैयार होती हैं।सराकरों की उदासीनता देखकर तो यही लगता है कि ऐसा ही चलता आया है और ऐसा ही चलता रहेगा।फिर किसी कोटा,राजकोट, मुजफ्फरपुर और गोरखपुर में बच्चों की किलकारियां शांत हो जाएंगी, फिर कार्रवाई की बात होगी और फिर अफसोस जताया जाएगा। पिछली सरकारों ने क्या किया? ये सवाल भी गद्दी पर बैठी सरकारों को नही करना चाहिए ,हालात पर काबू पाना वर्तमान सरकार का काम है।सवाल यही है कि लचर स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने का काम प्राथमिकता पर क्यों नही है? बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देश में रहने वालों का बुनियादी हक है और तंत्र को पहली ही मौत से सचेत हो जाना चाहिए।उस परिवार के दर्द को समझना चाहिए जिसने एक मौत के रूप मे अपना सपना,अपना भविष्य सब खो दिया।

शाहिद नकवी 

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