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मार्मिक व्यंग्य : मक्खी की दिल्ली यात्रा

एक नर मक्खी थी। दूसरी मक्खियों की तुलना में इसकी जिंदगी बड़ी तंगदिल थी। कभी आराम करने का समय ही नहीं मिला। एक दिन हैदराबाद से नई दिल्ली जानेवाली तेलंगाणा सुफरफास्ट एक्सप्रेस के एक डिब्बे में एक यात्री के लड्डू पर जा बैठी। लड्डू था बड़ा मजेदार। उससे रहा न गया। वह उसी पर बैठी रही। तब तक गाड़ी स्टेशन छोड़ चुकी थी। इतने दिन तक हैदराबाद में रहने वाली मक्खी अपने परिजनों से बिछुड़ने का दुख मना रही थी। लेकिन उसका यह मलाल थोड़ी ही देर में रफू चक्कर हो गया। उसकी आँखें नागपुर में चढ़ी मादा मक्खी से दो-चार हो गयी। अब तो उसका सफर बड़ा रोमांटिक हो चला था।
कहते हैं प्यार में बड़ों-बड़ों के छक्के छूट जाते हैं। वही हालत हुई हैदराबाद में चढ़ी मक्खी का। गाड़ी में नर-मादा मक्खियों की हालत एक अनार सौ बीमार की तरह थी। एक मादा मक्खी पर कइयों नर मक्खी फिदा थे। हैदराबाद की मक्खी को लगा अगर मैं इस चक्कर में पड़ा तो दूसरे मजनू मक्खी मेरा कचूमर बना देंगे। उसने उसी समय इश्क से हाय-तौबा कर ली।
रह-रहकर उसका मन किसी रेल्वे स्टेशन पर उतर जाने को करता था। लेकिन उसका पाला चालू डिब्बे से पड़ा था। डिब्बे में तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली के कई यात्री चढ़े। सबकी दुखभरी राम कहानी थी। उन्हें सुनने वाला कोई नहीं था। रास्ते में वे एक-दूसरे से अपने दुख बाँट लेते थे। कहना न होगा कि राज्य बदलने से लोगों की समस्याओं में किसी प्रकार का बदलाव नहीं आया। इन यात्रियों में अधिकतर किसान थे। आश्चर्य इस बात का था कि अलग-अलग राज्यों के किसानों को अपना दुख व्यक्त करते समय धर्म, जात-पात, भाषा, लिंग की कोई अड़चन नहीं आयी। कहते हैं पीडा जात-पात, ऊँच-नीच, भेद-भाव, रंग, धर्म, लिंग, भाषा से ऊपर होती है। यह जिसे भी भेदती है उसे तार-तार कर देती है। सभी किसानों की अमूमन एक ही तरह की समस्या थी। खेती-बाड़ी करना उनके लिए दूभर हो गया था। कर्जा लेकर खेती करते हैं तो असमय बाढ़ अथवा अकाल की चपेट में आकर फसल दम तोड़ देती है। यदि फसल तैयार भी हो जाती है तो उसका सही मूल्य नहीं मिलता। या तो उन फसलों को सस्ते दामों पर बेच देना प़ड़ता है या फिर सड़क पर फेंककर असमय फांसी पर लटकने की तैयारी में जुट जाना पड़ता हैं। मक्खी को लगा कि भारत में किसान होना आज के समय का सबसे बड़ा अभिशाप है।
उसी गाड़ी में छोटे व्यापारी, खोमचे वाले, फुटपाथ अथवा सड़क किनारे सामान बेचने वाले सफर कर रहे थे। इनमें अधिकतर लोग किसानी से व्यापार में अपना भाग्य आजमाने के लिए उतरे थे। इनका दुर्भाग्य देखिए कि नोट बदली और सूपर मार्केटों की चपेट में ऐसे आए मानो शिकारी के मुँह में शिकार। इनकी कमर टूट चुकी थी। जो लोग ऐसे-तैसे जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे, अब वे दर-दर की ठोकर खा रहे थे। एक तो नोटबंदी के चलते व्यापार बंद हुआ तो दूसरी ओर रोजगार देने के लिए कोई तैयार नहीं था। इनकी हालत आसमान से टपके तो खजूर में अटके वाली हो गयी थी।
गाड़ी में सबकी समस्याओं में जो बातें साम्य थीं, वे थीं- गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, आए दिन लड़कियों की अस्मत पर हमला, कहीं धर्म के नाम पर तो कहीं वर्ण के नाम पर आए दिन होने वाले हमले, लूटपाट और न जाने क्या-क्या। फेहरिस्त इतनी लंबी थी कि मक्खी के लिए इतना सब कुछ याद रखना मुश्किल था। नन्हीं-सी जान कितना कुछ याद रखती!
जैसे-तैसे गाड़ी नेताओं के चुनावी वायदों की तरह नियत समय से चार घंटे देरी से पहुँची। मक्खी को लगा कि जब वह दिल्ली पहुँच ही चुकी है तो क्यों न लोगों की समस्या देश के प्रधान तक पहुँचा दे। पता लगा-लगाकर देश के प्रधान तक पहुँची। लेकिन क्या फायदा? क्लर्क बाबू के फाइल पर जैसे ही बैठी वैसे ही उसने फाइल से दे मारा। चारों खाने चित्त। बेचारी मक्खी दिल्ली के सफर में अपने जिंदगी से ही हाथ धो बैठी।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाणा सरकार,
मोबाइल नं. 73 8657 8657,
Email: [email protected]
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