National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

मन की बात… आप भी जऱा सुनें, पढ़ें….!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए देश में इक्कीस दिनों का लॉकडाउन किया है। फिलहाल लॉकडाउन ही कोरोना को रोकने का एकमात्र हथियार है, लेकिन कुछ लोग हैंं कि जैसे उनके ऊपर प्रधानमंत्री जी की अपील का कोई असर ही नहीं है। कोई सड़कों पर घूम रहे हैं, कोई बाजार में घूम रहे हैं। और तो और कोई कोई तो मात्र यह देखने के लिए सड़कों पर आ रहे हैं कि कितने लोग घर से बाहर घूम रहे हैं। घूम भी रहें या नहीं। हमने इटली का मंजर देखा, हमने वुहान, अमरीका, न्यूयॉर्क, इराक, स्पेन, फ्रांस किस किस का मंजर नहीं देखा । फिर भी ताज्जुब है कि हमारे दिमाग में कोई बात सीधे सीधे घुसती ही नहीं है। हमें घर में टिकने की आदत ही नहीं है। अरे भैैैया जी, यदि आदत नहीं है तो हम कहते हैंं कि आदत डाल लिजिए। अब कुछेक दिनों की ही तो बात है। हम यदि घर से बाहर नहीं निकलेंगे, कुछ दिन ऑफिस,बाजार या सड़क पर नहीं जायेंगे तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है। हमारे बिना भी, काम वैसे ही चलेगा, जैसे चलना चाहिए। जो जहाँ हैं, वह वहीं रहें की अपील देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा की गई है तो वह मानवता की भलाई के लिए ही कही गई होगी। इससे पहले तो आपसे हमसे ऐसी अपील किसी ने भी नहीं की। जरा सोचिए। हम तो कहते हैं कि घर में रहने जैसा आनंद कहीं भी नहीं है। यकीन मानिए घर तो स्वर्ग है। आप घर में रहिए, घर के सदस्यों से बातें कीजिए, हंसी मजाक कीजिए, खाइए पीयें, आराम करें, टीवी देखें, अब तो रामायण भी शुरू कर दी गई है, फिल्में देखें, बच्चों के साथ सांपसीढ़ी, लुडो,बिजनेस, कैरम खेलें, इंटरनेट चलाएं, घर से आफिस का काम करें, आखिर दिक्कत कहाँ हो रही है।लेकिन हमारा मानना है कि यह दुनिया हमेशा उलटी चलती है। हमारे यहाँ लोगों को गंगा को उलटा बहाने की आदत है। कहा कुछ जायेगा, किया कुछ जायेगा। अजी अपनी ही दाल को मत गलाओ। कभी दूसरों के लिए भी जीओ। दूसरों के लिए जीओगे तो आप स्वयं के लिए भी जीओगे, ऐसा हमारा मानना है। थोड़ा हटकर कहना चाहूंगा कि जब से यह कोरोना आया है, तब से कुछ मुनाफाखोर, कालाबाजारी करने वाले मुनाफा कमाने व कालाबाजारी करने में लगे हैं, नकली मॉस्क, नकली सेेनेटाइजर, नकली दवाएं बेच रहे हैं। औने पौने दामों की चीजों के अनाप शनाप पैसे वसूल रहे हैं। कुुुछ लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उलटी सीधी पोस्ट, आडियो, विडिओ डाल रहे हैं। कुछ ने कोरोना को मजाक बना लिया है, चुटकलेेंं ,हास्य की भरमार है। हद हो गई। यह भी कोई तरीका है। ऐसे लोग हमें मानवता के दुश्मन नजर आतेे है। अजी,दुनिया,देेेश संकट की घड़ी से गुजर रही है और आप अपनी ऊल जलूल करतूूतोंं से बाज नहीं आ रहे हो। हमें तो घोर
ताज्जुब होता है जी। सभी देशों की अर्थव्यवस्था की चक्करघिन्नी बन चुकी हैं, लोग मारे जा रहे हैं, गरीब, मजदूर, किसान, व्यापारी वर्ग, विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग सभी परेशान हैं। अभी हमने तीन चार रोज से अखबारों व सोशल नेटवर्किंग साइट्स व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर देखा कि कुछ लोग गरीबों, जरूरतमंदों को सहायता पहुंचा रहे हैं, बहुत अच्छी बात है, लेकिन फोटो खिंचवाकर उसे अखबारों, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रस्तुत करने की होड़ लगी है कि हमनें ये अमुक परिवार, अमुक गरीब, मजदूरों की सहायता की। अजी, हम तो कहेंगे नेकी कर और दरिया में डाल। नेकी करो और भूल जाओ। आप मानवता के लिए काम कर रहे हो, फिर इसकी जरूरत क्या है। सबको पता है, सभी को जानकारी है कि आपने जरूरतमंदों की सहायता की है। अपने भामाशाहपन को दिखाना जरूरी थोड़े ही है। भामाशाह या समाज सेवा के लिए जो भी लोग आगे आते हैं, बहुत ही अच्छी बात है, नर सेवा नारायण सेवा है, यह हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता का प्रतीक हैं। हम भूखों को रोटी,प्यासों को पानी पिलाएं, यही हमारा धर्म है। मानवता का धर्म हमें निभाना चाहिए। नाम व फोटो आना जरूरी नहीं है। जरूरी है तो जरूरतमंदों की हर प्रकार से सहायता करना। जितनी हम कर सकते हैं, उतनी करनी चाहिए। मानव होने के नाते हमारा कर्तव्य यही है। हम मानवता के लिए जीएंं, मानवता की भलाई के लिए करें। हम ऐसे भाव रखें –
” चिड़िया चोंच भर ले गई…..
नदी न घट्यो नीर…।”
नदियां निस्वार्थ भाव से बहती है, हमें भी नदियों की तरह बनना है, नदियों से हमें प्रेरणा लेनी है। जिस प्रकार से एक नदी में से चिड़िया के द्वारा पानी की चोंच भर लेने से उसका जल घट नहीं जाता, उसी प्रकार से यदि हम समर्थ है तो हमें मानवता की भलाई के लिए आगे आना चाहिए। यहां इसके लिए हमें अपने निजी स्वार्थों का त्याग करना होगा। मानवता का पहलू स्वार्थ पर नहीं टिका है। स्वार्थ और मानवता एक साथ नहीं चल सकते। निस्वार्थता, मानवता का साथ दे सकती है, देती रही है, देती रहेगी। इसलिए मानव बनने का प्रयास करें, निज स्वार्थों को त्यागते हुए हमेशा दूसरों का कल्याण करें। सेवा में ही मेवा है, इसलिए सेवा के भाव को अपने मन ,अपनी आत्मा में संजोए रखें। मानवता की साधना करनी चाहिए क्योंकि यही जीवन की असली साधना है। हमेशा अपने ऊपर और ईश्वर पर भरोसा रखें। अपने भरोसे को डगमगाने न दें। वर्तमान में समय थोड़ा विकट है, लेकिन यह समय हमेशा विकट ही नहीं रहेगा। अब जब पूरा विश्व कोरोना संकट को झेल रहा है, एकजुट होने का समय है। यह समय की ही बात है कि हम इस बड़े संकट को झेल रहे हैं। किसी कवि ने समय के बारे में क्या खूब और सटीक लिखा है –
” समय समय की वार्ता,
समय समय का फेर….।
समय लगा दे ठाठ बाट….
जाते न लागे देर….।।”
इसलिए मानव को चाहिए कि वह हमेशा समय की कद्र करें। आज समय यदि बुरा है, खराब है तो कल अच्छा होगा, यह निश्चित है, इसमें किसी को कोई भी शंका या संदेह नहीं होना चाहिए। हमें चाहिए कि हम हमेशा समय की कद्र करते हुए सकारात्मकता के बीजों को अपने मन व आत्मा में अंकुरित करें। सकारात्मकता के बीजों से मानवता का अंकुर फूटेगा। निराश मन हमें गर्त की ओर ले जाता है, हमारे अंदर नैराश्य की भावना नहीं होनी चाहिए। जीवन को नैराश्यपूर्ण बनाना और उसे खुशी, उमंग और उत्साह के साथ जीना, सिर्फ़ और सिर्फ़ आदमी की सोच पर निर्भर करता है जी। हमारी सोच सकारात्मक, अच्छी होनी चाहिए। हम अपनी अच्छी और सकारात्मक सोच से एक नवीन ऊर्जा का निर्माण इस ब्रह्मांड में कर सकते हैं। हम अति आध्यात्मिक देश है। विश्व गुरु का दर्जा हमें यूं ही नहीं दिया गया है। हम अविश्वसनीय हैं, अद्भुत है, अकल्पनीय है। ये हमारे मन की बात है, जो हमने आपसे साझा की। जय रामजी की।

धार्विक नमन, “शौर्य”, पटियाला, पंजाब
स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार
मोबाइल 7002291248

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar