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मूवी रिव्यू : शुभ मंगल ज्यादा सावधान

रोज हमें लड़ाई लड़नी पड़ती है जिंदगी में, पर जो लड़ाई परिवार के साथ होती है, वो सारी लड़ाई सबसे बड़ी और खतरनाक होती है। आनंद एल राय निर्मित और हितेश केवल्या निर्देशित ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ का यह डायलॉग समलैंगिक कम्युनिटी की बेबसी और संघर्ष को बयां करता है। वाकई आज भले कानून ने समलैंगिता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया हो, मगर समलैंगिक समुदाय को होमोफोबिया के रूप में अपने ही परिवारों से घृणा, तिरस्कार और रिजेक्शन सहना पड़ता है। फिल्म इस पॉइंट को साबित करने में सफल साबित होती है कि सिर्फ कानून बनाने से बात नहीं बनेगी, सामजिक तौर पर यह काउंसिलिंग होनी भी जरूरी है कि होमोसेक्शुलिटी कोई बीमारी नहीं बल्कि कुदरत है, प्रकृति है और उससे आप नफरत नहीं कर सक सकते।

कहानी के शुरुआती दौर में ही यह साफ हो जाता है कि कार्तिक (आयुष्मान खुराना) गे है और वह अमन त्रिपाठी (जितेंद्र कुमार) से प्यार करता है। उनका असली संघर्ष तब शरू होता है, जब अमन की कजिन की शादी के दौरान अमन के पिता शंकर त्रिपाठी (गजराज राव) उन दोनों को ट्रेन में चुम्बन करते हुए देख लेते हैं। अमन के पिता अपने बेटे की होमोसेक्शुलिटी को समझ भी नहीं पाए थे कि शादी के दौरान दोनों के रिश्ते का सच सबके सामने आ जाता है। उसके बाद तो दोनों के प्यार में कई दीवारें खड़ी करने की कोशिश की जाती है।

कलाकार : आयुष्मान खुराना, जितेन्द्र कुमार, गजराज राव, नीना गुप्ता
निर्देशक : हितेश केवल्या
अवधि : 2 घंटा 10 मिनट

क्यों देखें: यूथ के साथ-साथ पैरंट्स भी इस फिल्म को जरूर देखें।

कार्तिक को मारा-पीटा जाता है। संयुक्त परिवार में भाई, बहन चाचा-चाची के बीच मां (नीना गुप्ता) अमन को समझाने की कोशिश करती है कि इस बीमारी का इलाज संभव है। मां पंडित जी से कर्म-कांड करवा कर अमन का अंतिम संस्कार कर उसे नया जन्म देने की विधि भी करवाती है। और तो और पिता आत्महत्या की कोशिश और धमकी देकर अमन को शादी करने पर मजबूर भी कर देते हैं। पिता और परिवार के लिए अमन शादी करने को राजी हो जाता है। मगर कार्तिक लगातार अमन को समझाता रहता है कि उसे अपने प्यार के लिए आगे आना होगा? क्या कार्तिक और अमन अपनी सेक्शुएलिटी के साथ परिवार की एक्सेप्टेंस हासिल कर पाते हैं? इसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

होमोसेक्शुएलिटी पर इससे पहले भी कई फिल्में बनी हैं, मगर निर्देशक हितेश ने इसे बहुत ही मजेदार और मनोरंजक ढंग से दिखाया है। इससे पहले बनी कई फिल्मों में समलैंगिकों की सेक्शुएलिटी पर ज्यादा फोकस किया गया था, जबकि इसमें उनकी पारिवारिक एक्सेप्टेंस के मुद्दे पर जोर दिया गया है। निर्देशक ने स्टोरी के प्लॉट को डेवलप करने में जरा भी वक्त जाया नहीं किया है। उन्होंने बताने की कोशिश की है कि प्यार का कोई लिंग नहीं होता। बैकड्रॉप में इलाहबाद जैसे छोटे शहर के बड़े से परिवार का निरंतर चलनेवाला क्या फिल्म को रिऐलिटिक होने के साथ-साथ कॉमिक रंग भी देता है। हां, फिल्म बीच में कई बार प्रीची भी होती है।

क्लाइमैक्स को फिल्माने में भी निर्देशक ने जल्दबाजी दिखाई है। फिल्म का फर्स्ट हाफ ज्यादा स्ट्रॉन्ग है। फिल्म के ‘शंकर त्रिपाठी बीमार बहुत बीमार, उस बीमारी का नाम होमोफोबिया है’, ‘ये नहीं कहते गे कहते हैं’ जैसे फिल्म के कई डायलॉग्स चुटीले हैं। संगीत की बात करें, तो तनिष्क बागची का संगीतबद्ध ‘गबरू’ रेडियो मिर्ची के टॉप ट्वेंटी में आठवें पायदान पर है जबकि ‘अरे प्यार कर ले’ जैसे रिमिक्स को भी काफी पसंद किया जा रहा है।

कार्तिक के रूप में आयुष्मान खुराना का फ्लैमबॉयंट और ‘भाड़ में जाओ वाला’ एटिट्यूड कहानी के लिए सोने पर सुहागा का काम करता है। इसमें कोई शक नहीं की आयुष्मान ने गे चरित्र को न केवल करने का रिस्क उठाया बल्कि उसे बेहद मजबूती से अंजाम दिया। उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उनका समलैंगिक चरित्र दर्शक को कहीं भी विरक्त नहीं करता। जितेंद्र कुमार की तारीफ करनी होगी कि अमन के रूप में वे कहीं भी उन्नीस साबित नहीं हुए। उन्होंने अपनी भूमिका को बेहद सटल अंदाज में निभाया है। माता-पिता के रूप मं नीना गुप्ता और गजराज राव की जोड़ी और केमेस्ट्री ने खूब मनोरंजन किया है। नीना और गजराज के हिस्से में ‘मां के पास दिल होता है’, ‘हां बाप तो बैटरी से चलता है’ जैसे फनी और इमोशनल संवाद भी आए हैं। दोनों ही कलाकारों ने मजाकिया और जज्बाती दृश्यों को बखूबी निभाया है। सपॉर्टिंग कास्ट में कजिन गूगल के रूप में मानवी गागरू, चाचा के रोल में मनुश्री चड्ढा और चाची के किरदार में सुनीता राजवर ने खुलकर हंसने पर मजबूर किया है।

सेंसर बोर्ड ने इसे ए सर्टिफिकेट दिया है। हालांकि समलैंगिता को लेकर जागरुकता फैलानेवाली इस फिल्म को यूए सर्टिफिकेट मिलना चाहिए था।

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