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मप्र में कांग्रेस की घरेलू कलह से हिली सरकार

मप्र में कमलनाथ सरकार पर छाया संकट असल में पार्टी आलाकमान की कमजोरी और मंत्रिमंडल चयन में बरती गई अपरिपक्वता का नतीजा है। 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 116 विधायक आवश्यक है ।वर्तमान में कांग्रेस के 114, बीजेपी के 107,बसपा के 2,सपा का 01 विधायक है।सपा,बसपा औऱ सभी 6 निर्दलीय विधायक सरकार को समर्थन दे रहे है।बीजेपी कांग्रेस के एक एक विधायक का निधन हो चुका है।इसलिए मौजूदा सदन में सदस्यों की संख्या 228 है।कमलनाथ ने 114 विधायकों के साथ सरकार बनाई थी।केवल एक निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को सरकार में मंत्री बनाया गया है।जबकि सरकार को समर्थन दे रहे लगभग सभी विधायक मंत्री बनने के लिये कमलनाथ पर आरम्भ से ही दबाब बनाये हुए है।इस बीच कांग्रेस ने मन्त्रिमण्डल चयन में अपने तमाम सीनियर विधायकों को अनदेखा कर नए लोगों को मंत्री बना दिया गया।मसलन 6 बार के विधायक रहे केपी सिंह ,5 बार के विधायक बिसाहूलाल सिंह की जगह दूसरी बार विधायक बने कई लोगों को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया गया।इस बीच मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया की खुली चुनौती से कमलनाथ की मुश्किलें पहले से ही बढ़ी हुई थी।ताजा संकट कांग्रेस के तीनों बड़े नेताओं दिग्विजयसिंह,कमलनाथ औऱ सिंधिया के बीच परम्परागत संसदीय जंग का एक पड़ाव भी है।अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दो दिन से लगातार दिग्विजयसिंह औऱ कमलनाथ बीजेपी पर हार्स ट्रेडिंग का आरोप लगाते रहे लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया से इस विषय पर पत्रकारों ने सवाल किए तो उन्होंने ऐसी किसी संभावना औऱ सूचना से इनकार कर दिया।जाहिर है मप्र के दिग्गज कांग्रेसियों के बीच न समन्वय है न संवाद। बड़े नेताओं के इस विवाद के चलते संगठन औऱ सरकार दोनों के बीच भी कोई समन्वय नही रहा।15 साल बाद मप्र में सरकार आई तो सभी नेताओं की अपनी अपनी भूमिकाओं से थी। लेकिन मन्त्रिमण्डल चयन के समय कांग्रेस की खेमेबाजी शिखर पर आ गई।सिंधिया ,कमलनाथ, दिग्विजयसिंह द्वारा जो नाम मंत्री पद के लिए कोटे से शामिल कराये गए उससे वरिष्ठता औऱ अनुभव का तत्व तिरोहित हो गया।जिन चार विधायकों के बेंगलुरु जाने की खबर है उनमें से बिसाहूलाल सिंह तो मप्र के सबसे कद्दावर आदिवासी नेताओं में एक है वह अर्जुन सिंह और दिग्विजयसिंह की सरकारों में मंत्री रह चुके है।उनके सामने पैदा हुए मरकाम सिंह और हनी बघेल जैसे आदिवासी विधायक कैबिनट मंत्री बना दिए गए।एदल सिंह कंषाना गुर्जर जाती के प्रभावशाली विधायक है उनका चंबल के इलाके में अच्छा प्रभाव भी है।मप्र में गुर्जरों ने इस बार थोकबंद वोट कांग्रेस को दिए लेकिन इस जातिसमाज से किसी को मंत्री नही बनाया गया।एदल सिंह सिंधिया पर आरोप लगाते रहते है कि उन्ही के वीटो के चलते सीएम ने उन्हें मंत्री नही बनाया।बागी हुए तीसरे विधायक हरदीप सिंह डंग है वे मन्दसौर की सुवासरा सीट से दुबारा चुनकर आये है और सिख समाज के इकलौते विधायक है।मन्दसौर में किसानों के आंदोलन से जुड़े डंग बहुत ही संघर्षशील नेता है।चौथे विधायक श्री शेरा ने प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस को निर्दलीय शिकस्त देकर सबको चौंका दिया था।शेरा को कांग्रेस ने तब भी अपना टिकट नही दिया था लेकिन वह मूल रूप से कांग्रेस नेता ही है।बसपा की रमावाई परिहार,संजीव कुशवाह,सपा के राजेश शुक्ला भी सरकार के लिए मुसीबत बन सकते है क्योंकि ये सभी बीजेपी नेताओं के साथ मानेसर के होटल में पहुँचे थे।
मप्र में केपी सिंह,बिसाहूलाल सिंह,घनश्याम सिंह,एदल सिंह,लक्ष्मण सिंह,जैसे सीनियर विधायकों को मंत्री न बनाया जाना असल में पार्टी के बड़े नेताओं की आपसी जंग का नतीजा है।यही नही मन्त्रिमण्डल में क्षेत्रीय औऱ जातीय सन्तुलन नही नही है।सरकार में वैश्य ,गुर्जर, सिख मीणा,नॉन जाटव दलितों का प्रतिनिधित्व भी नही है।इस मौजूदा संकट से कांग्रेस में कमलनाथ औऱ दिग्विजयसिंह ही जूझते नजर आ रहे है ,सिंधिया परिदृश्य से गायब है।दो दिन पहले दिग्विजयसिंह ने दिल्ली में विधायकों को बीजेपी द्वारा खरीदने के आरोप लगाएं गए अगले दिन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इन आरोपों पर अपनी मोहर लगाई ।लेकिन जिस समय मप्र सरकार को समर्थन दे रहे 9 विधायक बीजेपी नेताओं के साथ दिल्ली उड़ान भर रहे थे तब सिंधिया ग्वालियर क्षेत्र में दौरा कर रहे थे।उन्होंने विधायकों की खरीद फरोख्त की किसी खबर से अनभिज्ञता व्यक्त की।प्रदेश में सिंधिया के साथ कमलनाथ औऱ दिग्विजयसिंह के रिश्तों में तल्खी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है आधी रात को दो मंत्री जीतू पटवारी औऱ जयवर्धन सिंह को दिल्ली में डैमेज कंट्रोल के लिये चुना गया। सिंधिया कोटे के किसी मंत्री को इस ऑपरेशन वापसी से दूर ही रखा गया।दिग्विजय सिंह रात को मानेसर तक विधायकों को वापिस लेने गए वह तीन दिन से इस मामले में खुद ही जूझते हुए दिख रहे है। दिग्विजयसिंह की मप्र की राजनीति में अंदरूनी पकड़ भी इस पूरे प्रकरण में स्वयंसिद्ध हुई। क्योंकि उन्होंने जो आशंका व्यक्त की थी वह सच साबित हुआ। इसका बहुत सरल आशय यह है कि मप्र में बीजेपी की रणनीति की जानकारी दिग्विजयसिंह तक भी लीक की गई है।

डॉ अजय खेमरिया

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