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कोरोना की गोद में ‘नोस्कर’

कुछ प्राणियों की माया विज्ञान, साहित्य, स्वास्थ्य, राजनीति, अर्थशास्त्र के क्षेत्र से लेकर अभिनय तक फैली हुई है। जहाँ देखो वहाँ इसी का गुणगान है। यही सब देखकर विद्वानों को दिए जाने वाले नोबल और अभिनेताओं को दिया जाने वाला ऑस्कर दोनों को मिलाकर ‘नोस्कर’ सम्मान का ईजाद किया गया। अब सवाल यह था कि दुनिया का वह कौनसा प्राणी है जो शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उतना ही स्थान रखता हो जितना की अभिनय में। चूंकि दुनिया भर में कोरोना महामारी ने इतना नाम कमाया है इसलिए नोबल पिता और ऑस्कर माता का जन्मा ‘नोस्कर’ सम्मान उसी की झोली में जाना तय था। हुआ भी वही। कोरोना देव को नोस्कर से सम्मानित करने का फैसला किया गया।

आखिर वह घड़ी आ ही गयी जिसका सभी को बेसब्री से इंतजार था। कोरोना देव ने नोस्कर सम्मान ग्रहण किया। दुनिया भर के कैमरे खिचिक-खिचिक करते हुए बड़ी देर तक उसे छवियों के रूप में कैद कर रहे थे। वैसे भी उसे कैमरे में कैद करने के सिवाय कर भी क्या सकते हैं? डॉक्टर-वैज्ञानिक जब तक इसके एक वेरिएंट को पकड़ने की कोशिश करते तब तक महाशय अपने कई रूप बदल लेता। डॉन की तर्ज पर ग्यारह मुल्कों की पुलिस की जगह दुनिया भर के डॉक्टर-वैज्ञानिक उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं, और साहब हैं कि किसी के हत्थे चढ़ना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।

नोस्कर ग्रहण करने के बाद कोरोना देव से कुछ सवाल पूछे गए। पहला सवला था – अथक कठोर परिश्रम करते हुए दुनिया भर में यात्रा करने का आपका अनुभव कैसा रहा? कोरोना ने कहा – सबसे पहली बात तो मैं अपने काम को काम नहीं मानता। इसलिए मुझे न थकान होती है और न परिश्रम करने की आवश्यकता। मैं यह काम मजे के लिए करता हूँ। मुझे देश-विदेश जाने के लिए न पासपोर्ट की जरूरत है न वीज़ा की। हवाई जहाज, चॉपर, रेल, बस, ऑटो, रिक्शा, साइकिल सबमें यात्रा कर सकता हूँ। अलग-अलग अनुभवों का भी अपना मजा होता है। मैं चाहूँ तो अरबपति के घर में ऐशो-आराम प्राप्त कर सकता हूँ, ऊब जाऊँ तो झोपड़पट्टी में रूखा-सूखा खाने का भी मजा लेता हूँ। मुझे नाम कमाने की कोई इच्छा नहीं है। चूंकि मीडिया मुझसे बना है न कि मीडिया से मैं, इसलिए मेरा नाम दुनिया भर में लोगों के पापों की तरह कहीं भी सुना, देखा, पढ़ा और लिखा जा सकता है। पहले मेरी पहुँच केवल शहरों तक थी। अब तो मैं गाँवों, बस्तियों से होते हुए माऊँट एवरेस्ट तक पहुँच गया हूँ। इसलिए मेरी जीवन यात्रा का अनुभव मेरे लिए हमेशा गर्व करने योग्य है।

प्रधानमंत्री से संतरी तक, विद्वानों से मूर्खों तक, अमीरों से गरीबों तक, पुरुषों से स्त्रियों यहाँ तक कि अन्यों तक सबमें छींक, जुकाम, खांसी, बुखार की महामारी बनकर आदमखोर बनने का जो असली रूप है, उसे आप कहीं अपने ऊपरी समाजवादी भेष के पीछे छिपाने का प्रयास तो नहीं कर रहे? कोरोना ने भड़कते हुए कहा – पहली बात तो आप समाजवादी शब्द को बदनाम मत कीजिए। मैं समाजवाद का उपासक था, हूँ और रहूँगा। मुझ पर पक्षपाती होने का आरोप कतई मत लगाइए। मैंने सबके साथ एक-सा व्यवहार किया है। विश्वास न हो तो आप पर करके दिखाऊँ क्या?

मीडियाकर्मी घबराए। न बाबा न! हमें बक्श दो। अच्छा यह बताइए कि इंसानों पर इस तरह टूट पड़ना क्या आपके लिए उचित है? आपको तनिक भी दुख नहीं होता? कोरोना ने आँखें फाड़ते हुए कहा – दुख? किस बात का दुख? आपको मालूम है कि मेरी दूसरी लहर चल रही है और आप हैं कि लोगों की परवाह किए बिना चुनावी रैलियों पर रैलियाँ करते जा रहे हैं, कुंभ मेला में डुबकियाँ लगा रहे हैं, आईपीएल करवा रहे हैं, कहीं, एंबुलेंस के नाम पर तो कहीं ऑक्सीजन के नाम पर, कहीं डॉक्टर के नाम पर तो कहीं कहीं दवाइयों के नाम पर, कहीं अधमरों के नाम पर तो कहीं शवों के नाम पर गिद्धों की तरह नोचकर खाते हुए जब आपको शर्म नहीं आती तो मुझे क्यों आएगी? मैं आपकी तरह धोखेबाज थोड़े न हूँ। मैं जिसके लिए पैदा हुआ हूँ वह काम पूरी शिद्दत के साथ करता हूँ। मैं समझौता नहीं करता। इतना कहते हुए कोरोना बेकाबू हो चला। मीडियाकर्मी स्थिति को भांपते हुए वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त

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