न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

“नैनो तरल यूरिया “,कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी खोज

यूरिया वह प्रथम कार्बनिक यौगिक है जिसे प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया था।पहले यह धारणा थी कि कार्बनिक यौगिक प्राकृतिक ही होते हैं,उन्हें मानव निर्मित नही किया जा सकता है,अर्थात प्रयोगशाला में संश्लेषित नही किया जा सकता था।यूरिया में नाइट्रोजन की प्रतिशतमात्रा लगभग  46%होती है। खबर चौकाने वाली है ना,लेकिन सच मानिए एकदम सच है। खेतों में फसलों में नाइट्रोजन  की आपूर्ति के लिए अब ना भारी भरकम यूरिया की बोरियों को ले जाने की आवश्कता होगी और ना ही यूरिया की किसानों को कोई किल्लत ,यूरिया के लिए ना हीअब किसानों को लंबी कतारों में लगना पड़ेगा ,क्योंकि सहकारी क्षेत्र की कंपनी इफको ने 31मई को एक बड़ी घोषणा की और कहा की सफेद दाने वाली यूरिया के भारी बैग को किसान अब बाय बाय कहें ,क्यो कि अब उपलब्ध है विश्व की प्रथम “नैनो तरल यूरिया” दुनिया भर के किसानों के लिए दुनिया का पहला नैनो यूरिया लिक्विड भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (इफको) द्वारा 31 मई, 2021 को पेश किया गया था।इफको ने 31 मई, 2021 को भारत मेऑनलाइन-ऑफलाइन मोड में आयोजित अपनी 50वीं वार्षिक आम सभा के दौरान बड़ा खुलासा किया।इफको के अनुसार, नैनो यूरिया लिक्विड (तरल)को इसके वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा कई वर्षों के शोध के बाद स्वदेशी तकनीक के माध्यम से विकसित किया गया है, जिसे नैनोबायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर, कलोल में ‘आत्म निर्भर भारत’ और ‘आत्म निर्भर कृषि’ के अनुरूप विकसित किया गया था।
 इफको के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित उत्पाद मिट्टी में यूरिया के उपयोग को कम करने के लिए प्रधान मंत्री के आह्वान पर अथक प्रयास के बाद विकसित हुआ।जानिए,नैनो यूरिया क्या है?
फसलों के पोषक तत्वों की दक्षता में सुधार के लिए नैनो-तकनीक से उत्पादित यूरिया को नैनो यूरिया कहा जाता है।  नैनो यूरिया तरल पारंपरिक यूरिया की जगह लेगा और यह अपनी आवश्यकता को कम से कम 50 प्रतिशत तक कम कर सकता है।नैनो यूरिया तरल का क्या लाभ है?नैनो यूरिया लिक्विड को पौधों के पोषण के लिए प्रभावी और कुशल पाया गया है, जो बेहतर पोषण गुणवत्ता के साथ उत्पादन बढ़ाता है।इफको के अनुसार, नैनो यूरिया तरल का भूमिगत जल की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर प्रभाव के साथ ग्लोबल वार्मिंग में कमी में बहुत महत्वपूर्ण है।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
नैनो यूरिया तरल की शुरूआत महत्वपूर्ण है क्योंकि किसानों द्वारा इसके उपयोग से मिट्टी में यूरिया के अतिरिक्त उपयोग को कम करके संतुलित पोषण कार्यक्रम को बढ़ावा मिलेगा।  यह फसलों को मजबूत, स्वस्थ बनाने और उन्हें रहने के प्रभाव से बचाने में मदद करेगा। अतिरिक्त यूरिया न केवल पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनता है बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाता है और पौधों को रोग और कीट के संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है, जिससे फसल की परिपक्वता में देरी होती है और इसके परिणामस्वरूप उत्पादन हानि होती है।नैनो यूरिया की कीमत कितनी होगी?• नैनो यूरिया लिक्विड किफ़ायती होगा क्योंकि यह सस्ता होगा और इससे किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।• नैनो यूरिया में 500 मिलीलीटर की बोतल में 40,000 पीपीएम नाइट्रोजन होता है, जो पारंपरिक यूरिया के एक बैग द्वारा प्रदान किए गए नाइट्रोजन पोषक तत्व प्रभाव के बराबर है।
• इससे न केवल किसानों की लागत में कमी आएगी बल्कि इसके छोटे आकार के कारण लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग की लागत में भी काफी कमी आएगी।• किसानों के लिए नैनो यूरिया की 500 मिलीलीटर की बोतल की कीमत 240 रुपये होगी, जो पारंपरिक यूरिया के एक बैग की कीमत से 10 प्रतिशत सस्ता है। प्रभावकारिता परीक्षण ,इफको ने नैनो यूरिया की प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए पूरे भारत में 94 से अधिक फसलों पर लगभग 11,000 किसान क्षेत्र परीक्षण (एफएफटी) किए थे।  हाल ही में देश भर में 94 फसलों पर परीक्षण किए गए, जिसमें उपज में औसतन 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।उत्पादन और रोलआउट
• नैनो यूरिया लिक्विड का उत्पादन जून 2021 तक शुरू हो जाएगा, इफको को सूचित किया।  इसके बाद जल्द ही वाणिज्यिक रोलआउट शुरू हो जाएगा।
 • इफको ने किसानों को इसके उपयोग और अनुप्रयोग के बारे में प्रदर्शित करने और प्रशिक्षित करने के लिए एक व्यापक देशव्यापी अभियान की योजना बनाई है। • नैनो यूरिया मुख्य रूप से इफको के ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिक्री के अलावा सहकारी बिक्री और विपणन चैनल के माध्यम से किसानों को उपलब्ध होगा ।नैनो टेक्नोलॉजी के महत्व और इसके लाभ आइए संक्षेप में जानते हैं।आजकल की बिज़ी लाइफ में नैनो टेक्नोलॉजी हर जगह पाई जाती है और यह लाइफ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है. देखा जाए तो यह तकनीक पहले भी हमारे बीच ही थी परन्तु इसपर ज्यादा शोध नही हुआ था और उतने साधन भी नहीं थे जो आज हैं. अब विज्ञान इतना उन्नत हो गया है कि नए प्रकार के शोध हो रहे है और इस तकनीक यानी नैनो टेक्नोलॉजी को एक नई दिशा मिली है. ऐसा कहा जा रहा है कि भविष्य में हर तकनीक का आधार नैनो होगा. वर्तमान में भी हमारी रोजमर्रा की जरुरत की चीजों से लेकर मेडिसिन और बड़ी-बड़ी मशीनरी में नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जा रहा है।नैनो टेक्नोलॉजी क्या है ?नैनो एक ग्रीक शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म, छोटा या बौना और नैनो ऐसे पदार्थ है जो अति सूक्ष्म आकार वाले तत्वों से बने होते है. अर्थार्त यह टेक्नोलॉजी वह अप्लाइड साइंस है, जिसमें 100 नैनोमीटर से छोटे पार्टिकल्स पर भी काम किया जाता है. नैनो टेक्नोलॉजी अणुओं व परमाणुओं की इंजीनियरिंग है, जो भौतिकी, रसायन, बायो इन्फॉर्मेटिक्स व बायो टेक्नोलॉजी जैसे विषयों को आपस में जोड़ती है.।क्या आप जानते है कि इस टेक्नोलॉजी की मदद से बायो साइंस, मेडिकल साइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है क्योंकि इससे किसी भी वस्तु को हल्का, मजबूत  और भरोसेमंद बनाया जा सकता है. यही कारण है की यह तकनीक तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं. इंजन में इस टेक्नोलॉजी की मदद से घर्षण होता है, जिसकी वजह से मशीनों की लाइफ बढ़ जाती है और ईंधन की खपत कम होती है.
ऐसा कहना गलत नही होगा की नैनो टेक्नोलॉजी साइंस का वो रूप है जिसके कारण मोबाइल ,नाखून जितना छोटा या ऐसी मशीनें जो शरीर के अंदर छोटे-छोटे कणों में जाकर ऑपरेशन कर सकें.  है ना हैरान करने वाली बात परन्तु इस टेक्नोलॉजी से यह सब संभव हैं.
नैनो टेक्नोलॉजी की शुरुआत कैसे हुई थी।नैनोसाइंस और नैनोटेक्नोलॉजी के पीछे विचार और अवधारणाएं, 29 दिसंबर 1959 को कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (CalTech) में एक अमेरिकी भौतिक सोसाइटी की बैठक में भौतिकशास्त्री रिचर्ड फेनमैन ने अपने एक व्याख्यान में कहा था “There’s Plenty of Room at the Bottom” और यही वाक्य आगे चलकर,नैनोटेक्नोलॉजी का आधारस्तम्भ बना. अपने भाषण में, फेनमैन ने एक प्रक्रिया का वर्णन भी किया जिसमें वैज्ञानिक अलग-अलग परमाणुओं और अणुओं को हेरफेर करने और नियंत्रित करने में सक्षम होंगे. रिचर्ड ने अपनी कल्पना में आने वाले कल का सपना देखा था। लेकिन तब उनके पास न तो इतने आधुनिक और सक्षम उपकण थे और न ही इतनी उन्नत सुविधाएँ। उनके लिए अणु-परमाणुओं से खेलना उतना आसान नहीं था, जितना आज हमारे लिए है. एक दशक बाद, अत्याधुनिक मशीनिंग के अपने अन्वेषण में, प्रोफेसर नोरियो तनिगुची ने ,नैनोटेक्नोलॉजी शब्द का प्रयोग किया था।एक तकनीक जिसे प्रधान मंत्री मोदी अपने भाषण में इस्तेमाल करते हैं
नैनोसाइंस और नैनो टेक्नोलॉजी के मौलिक सिद्धांत ,यह कल्पना करना भी कठिन है कि कितनी छोटी नैनो टेक्नोलॉजी होती है. एक नैनोमीटर एक बिलियन मीटर होता है, या 1 नैनो मीटर = 10-9 मीटर. उदाहरण हैं:
– एक इंच में 25,400,000 नैनोमीटर होते हैं.
– अखबार की एक शीट लगभग 100,000 नैनोमीटर मोटी होती है। एक तुलनात्मक पैमाने पर, यदि एक संगमरमर एक,नैनोमीटर का है, तो एक मीटर पृथ्वी का आकार होगा. सोचिये!नैनोसाइंस और नैनोटेक्नोलॉजी में परमाणुओं और अणुओं को देखने और नियंत्रित करने की क्षमता होती है. पृथ्वी पर सब कुछ परमाणुओं से ही तो बना होता है- चाहे वो खाना हो जो हम खाते हैं, जो कपड़े पहनते हैं, इमारतें और घर हमारा शरीर आदि. लेकिन आंखों की मदद से परमाणु को देखना असंभव है. यहाँ तक की माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता हैं.
नैनोस्केल में चीजों को देखने के लिए आवश्यक सूक्ष्मदर्शी माइक्रोस्कोप का लगभग 30 साल पहले ही आविष्कार हुआ था. स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोप (एसटीएम) और परमाणु बल माइक्रोस्कोप (एएफएम) के साथ ही नैनो टेक्नोलॉजी का भी जन्म हुआ था.।नैनो टेक्नोलॉजी के लाभ,नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से नैनो आकर में पदार्थ को नियंत्रित करके कई ऐसे अनुप्रयोग किये जा सकते है जो सामान्य दशा में संभव नहीं होते हैं,।नैनोटेक्नोलॉजी में काम आने वाले पदार्थों को नैनोमटैरियल्स कहा जाता है.
इस टेक्नोलॉजी के कुछ उपयोग इस प्रकार हैं:- नैनो टेक्नोलॉजी से खाद(ऊर्वरक )बनाई जा सकती है जिससे फसल के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। नैनो तकनीक का उपयोग हमारे कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज में बहुत पहले से ही हो रहा है उदाहरण के लिए कंप्यूटर के सर्किट और प्रोसेसर को बनाने के लिए “सिलिकॉन “का इस्तेमाल किया जाता है जो कि एक अर्धचालक है। आने वाले समय में इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बल्ब में भी होगा किसके कारण बिजली की खपत भी कम होगी और रौशनी भी अधिक होगी।
 इससे ऐसी सूक्ष्म दवा बनाई जा सकेगी, जो कैंसर की करोड़ों कोशिकाओं में से किसी एक को पहचान कर उसका अलग से इलाज कर सकेगी।  नैनो तकनीक में किसी भी पदार्थ की मॉलीक्यूलर असेंबलिंग को समझ कर उसके आकार को आपके बाल के आकार जितना छोटा बनाया जा सकता है और इसकी प्रोसेसिंग क्षमता भी आज की तुलना में कई गुना बेहतर होगी.
भविष्य में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं होगा, जो नैनो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करेगा. तकनीकी जानकारों का मानना है कि आने वाला समय नैनो टेक्नोलॉजी का होगा.।आइए जानते हैं उस किसान के वैज्ञानिक बेटे के बारे में जिसने “नैनो तरल यूरिया” की देश को सौगात दी।भारत दुनिया का वो पहला देश बना है, जहां नैनो यूरिया तरल लॉन्च हो गई। इसे किसानों की संस्था इफको ने तैयार किया है, लेकिन खेती में बड़ा बदलाव लाने वाले इस उत्पाद के पीछे एक किसान के बेटे की मेहनत और शोध है, नाम है डॉ. रमेश रालिया।किसान का वैज्ञानिक बेटा जिसने नैनो तरल यूरिया की देश को सौगात दी
नैनो यूरिया लॉन्च करते हुए इफको ने कहा कि भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश है। इफको के एमडी ने इस उत्पाद किसानों के लिए सौगात बताया। बताया गया ये आधा लीटर (500मिली) का ये डिब्बा वही काम करेगा जो 45 किलो वाली यूरिया की बोरी करती थी।
किसी भी पौधे या फसल की बढ़ोतरी के लिए नाइट्रोजन की जरुरत होती है। मौजूदा खेती में यूरिया, नाइट्रोजन का सबसे बड़ा स्त्रोत है। लेकिन जितनी यूरिया का खेतों में प्रयोग किया जाता है उसका मुश्किल से 30 से 40 फीसदी भाग पौधों के काम आता है बाकी हवा, मिट्टी में बेकार चला जाता है। जो हवा में जाता है वो पर्यावरण के लिए हानिकारक ग्रीन हाउस गैसों का कारण बनता है और जो मिट्टी में जाता है उससे मिट्टी अम्लीय होती और धरती के अंदर (भूमिगत) पानी दूषित होता है। लेकिन दावा किया गया है कि नैनो यूरिया इन सब खामियों को काफी दूर कर सकता है।
इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने 31 मई को जिस नैनो यूरिया तरल को किसानों को समर्पित किया, वो जिस प्रयोगशाला में बनाई गई है और जो उसे बनाने वाला है वो एक किसान का बेटा है। इफको की नैनो यूरिया तरल के पीछे डॉ. रमेश रालिया का शोध और मेहनत है।
डॉ. रमेश रालिया इफको की गुजरात के गांधीनगर के कलोल में स्थित रिसर्च सेंटर “नैनो जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र” के रिसर्च एंड डेवलपमेंट हेड और सेंटर के जनरल मैनेजर हैं।
मूलरुप से राजस्थान में जोधपुर जिले के गांव खारिया खंगार से रहने वाले डॉ. रालिया के मुताबिक उनके माता-पिता गांव में ही रहते और खेती करते हैं। किसान के बेटे डॉ रमेश रालिया के नाम नैनो टेक्नॉलोजी में फिलहाल 15 पेटेंट हैं। इफको का नैनो यूरिया तरल उसमें से एक है।
डॉ रमेश रालिया  “नैनो यूरिया तरल “को लेकर लंबी बाते बताते हैं। उन्होंने नैनो यूरिया तरल उत्पाद के किसानों, देश और पर्यावरण के लिए  फायदे गिनाए।”साधारण यूरिया जो हम प्रयोग करते हैं पौधे केवल उसका 30-40 फीसदी ही उपयोग ले पाते हैं। यूरिया का बहुत बड़ा भाग हवा या जमीन में चला जाता है। जबकि नैनो यूरिया का 80 फीसदी उपयोग पौधे कर पाते हैं। ये इसका सबसे बड़ा फर्क है।” नैनो यूरिया और साधारण यूरिया के रासायनिक फर्क को डॉक्टर रालिया साधारण शब्दों में बताते हैं, ” साधारण यूरिया को पौधा “आयन “के रुप में लेता है नैनो यूरिया को “पार्टिकल” के रुप में ,लेता है। पार्टिकल आयनों का एक समूह होता है। आयन रिएक्टिवेट (रसायन प्रतिक्रिया की अवस्था- जिसके रासायनिक गुण अन्य पदार्थों से मिलने परिवर्तित हो जाएं) की स्थिति होती है, जबकि पार्टिकल (कण) एक स्टैबल (स्थिर) अवस्था होती है। स्थिर रुप में होने के चलते कण पौधे के अंदर पहुंचकर नाइट्रोजन छोड़ते हैं, जिससे नाइट्रोजन को पौधा बहुत अच्छे तरीके ग्रहण कर पाते हैं।”साधारण यूरिया सफेद दानों के रुप में होती है। जिनका फसल छिड़काव किया जाता है। ये दानें हाइड्रोलाइज (गलते) होते हैं फिर पौधे उसे आयन के रुप में ग्रहण करते हैं। जबकि नैनो यूरिया तरल के कण (नैनोपार्टिकल) एक मीटर के एक अरबवें हिस्सा के बराबर होते हैं जिससे वो पौधे में सीधे प्रवेश कर जाते हैं।डॉ. रालिया बताते हैं कि विदेशों में कृषि क्षेत्र में बहुत सारे नैनो प्रोडक्ट लॉन्च हुए हैं लेकिन तरल यूरिया के रुप में ये दुनिया का पहला उत्पाद है।दुनिया में ‛नैनो टेक्नोलॉजी’के जाने माने साइंटिस्ट्स में शुमार डॉ रालिया नैनो यूरिया और इफको के साथ अपने सफर के बारे में  बताते हैं,”मेरे पास कुल 15 पेंटेट हैं, जिसने नैनो यूरिया तरल एक है। मैं साल 2015 से इसके लिए प्रयास कर रहा था। 2015 में पीएम नरेंद्र मोदी का  खत भी मिला था। जिसके बाद इफको से वार्ता शुरु हुई और 2019 में मैं इफको के साथ जुड़ गया।”
वो आगे बताते हैं, ” गुजरात में इसके लिए विशेष नैनों रिसर्च सेंटर बनाया गया है, जिसका मैं शोध और विकास प्रमुख हूं। नवंबर 2019 में इस उत्पाद का भारत में देशव्यापी प्ररिक्षण शुरु किया गया था।”इफको के मुताबिक 2 साल से ज्यादा इसका खेतों में परीक्षण किया गया है।
वो बताते हैं, “देश के 30 एग्रो क्लाइमेटिक जोन के 11000 किसानों के खेतों में 94 फसलों में इसका 2 साल तक ट्रायल चला है। भारतीय कृषि अनुंसधान परिषद (ICAR) के 20 से ज्यादा संस्थानों और कृषि विश्वविद्यायों में इसका परीक्षण हुआ है।”
जलवायु परिवर्तन,बढ़ते प्रदूषण और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए इस उत्पाद पर लोगों की निगाहे टिकी हैं।
डॉ. रालिया कहते हैं, “पर्यावरण के संदर्भ में बात करें तो “यूरिया “का बहुत बड़ा भाग नाइट्रस ऑक्साइड के रुप में ग्रीन हाउस गैस के रुप में जाता है। वो नैनो यूरिया के रुप में हम बचा सकते हैं। यूरिया के प्रयोग से हमारी मिट्टी में पीएच संतुलन बिगड़ जाता है। अमोनिया के चलते जमीन अम्लीय (Acidic) हो जाती है, इससे जो आवश्यक पोषक तत्व पौधे को चाहिए वो ग्रहण नहीं कर पाता है। जबकि नैनो यूरिया का मिट्टी के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता है।”इसके अलावा यूरिया का एक बैग 266रुपए का आता है जिसमे केंद्र सरकार यूरिया बनाने वाली कंपनियों को सब्सिडी के रूप में मोटी रकम देती हैं।
डॉ. रालिया अमेरिका के ग्रीन कार्डधारक हैं, वहां उनकी खुद की कंपनी (एंटरप्रेन्योर) और स्टार्ट्अप है। लेकिन उनका मन भारत में बसता है।  रॉलिया कहते हैं की ”  मां चाहती हैं कि उनकी तरह ही खेतों में काम करने वाले सभी कृषक कंप्यूटर सीखें, जिससे वो देश दुनिया से सीधे जुड़ सकें।”रालिया आगे बताते हैं, “मन में यही सपना रहता था कि किसान और खेतों में जान झोंकने वाले लोगों के जीवनस्तर में सुधार कैसे लाया जाए। सही मायनों में मेरा कृषि वैज्ञानिक होना तब कारगर साबित हो पाएगा, जब मेरे ज्ञान का फायदा किसानों तक पहुंचेगा और उनके जीवनस्तर में उत्थान आए।”15 पेटेंट और सैकड़ों शोधपत्रों वाले डॉ. रालिया को पहली बार साइकिल तब मिली थी जब वो बीएससी कर रहे थे।साल 2009 में जोधपुर स्थित आईसीएआर के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) में विश्व बैंक द्वारा कृषि नैनो टेक्नोलाजी के पहले प्रोजेक्ट में रिसर्च एसोसिएट के रूप में उनका चयन हुआ था। पीएचडी के दौरान ही उन्हें अमेरिका से बुलावा आ गया था।डॉ. रालिया बताते हैं,”पीएचडी के दौरान वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से वहां के डिपार्टमेंट हेड ने मेरी काजरी की लैब विजिट की, हमारा रिसर्च वर्क देखा। उनके साथ खाना खाते वक़्त रिसर्च की बातें हुईं। जब उन्हें गेस्ट हाउस तक छोड़ने गया तो उन्होंने कहा कि यदि तुम वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ज्वाइन करना चाहो तो मैं तुम्हें पोजीशन ऑफर कर सकता हूं। लेकिन मैंने पीएचडी पूरी करने एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल की परीक्षा देकर जाने का निर्णय लिया, जिसे वाशिंगटन यूनिवर्सिटी ने स्वीकार कर लिया।”अमेरिका में काम करते हुए उन्होंने 60 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों के साथ नैनो तकनीक पर काम किया। फिलहाल वो भारत में हैं और नैनो तरल यूरिया के जरिए खेती में नई क्रांति का जरिया बने हैं।किसानों को ये नैनो यूरिया तरल 15 जून के बाद उपलब्ध होगी। वो आगे बताते हैं, “एक लीटर पानी में 2 मिलीलीटर नैनो यूरिया तरल मिलाकर पौधे के जीवन में सिर्फ दो बार छिड़काव करना है।”इस तरह बकौल डॉक्टर रालिया
“नैनो फर्टिलाइजर और नैनो पेस्टिसाइड बचाएंगे किसान का पैसा,”। हमारे लिए बड़े गौरव की बात है कि60 देशों को नैनो फर्टिलाइजर से खेती करना सिखा रहे हैं “भारतीय युवा वैज्ञानिक डॉक्टर रालिया”।इस प्रकार विश्व का पहला नैनो यूरिया तरल ,भारतीय कृषि वैज्ञानिक द्वारा भारतीय कृषि और कृषको को एक बड़ी सौगात है,नैनो यूरिया तरल ,भारतीय कृषि के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।जय जवान, जय किसान,जय विज्ञान ।
डॉक्टर रामानुज

 

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar