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प्रकृति के सुकुमार कविः सुमित्रानंदन पंत

28 दिसंबर : प्रथम हिंदी ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सुमित्रानंदन पंत की पुण्यतिथि

आज का दुख, कल का आह्लाद,
और कल का सुख, आज विषाद;
समस्या स्वप्न गूढ़ संसार,
पूर्ति जिसकी उस पार
जगत जीवन का अर्थ विकास,
मृत्यु, गति क्रम का ह्रास !
उपर्युक्त पंक्तियों में यह बताया गया है कि जीवन में आज दुख है तो कल सुख और कल सुख है तो आज दुख। जीवन तो सुख-दुख का नाम है। यह संसार समस्याओं का गढ़ है, जिसका समाधान जीवन में निरंतर गतिशील बने रहने पर ही प्राप्त होता है। जीवन का अर्थ विकास है और मृत्यु उस विकास के थमने का नाम है। इसीलिए जीवन में जब तक जियो तब तक गतिशील रहो। जीवन को अर्थवान बनाओ। इतने सुंदर विचारों से हमें अवगत कराने वाले कोई और नहीं, बल्कि प्रकृति के सुकुमार, बेजोड़, छायावाद के अग्रदूत तथा हिंदी साहित्य में प्रथम ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त करने वाले चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। आज हिंदी के इस महान कवि की पुण्यतिथि है।

जन्म तथा प्रारंभिक जीवन
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, 1900 में उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गाँव में हुआ था। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ का देहांत हो गया। बचपन में इनका नाम गुसाईं दत्त रखा गया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा कौसानी गांव के स्कूल में हुई, फिर वे वाराणसी आ गए और ‘जयनारायण हाईस्कूल’ में शिक्षा पाई, इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद में ‘म्योर सेंट्रल कॉलेज’ में प्रवेश लिया, पर इंटरमीडिएट की परीक्षा में बैठने से पहले ही 1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। इस तरह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी इन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, 1900 में उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गाँव में हुआ था।

कवि बनने की प्रेरणा
जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि से बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं है। माँ को खो देने के बाद स्लेटी छतों वाले पहाड़ी घर, आंगन के सामने आडू, खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पिल पगडण्डियां, बांज, बुरांश व चीड़ के पेड़ों की बयार व नीचे दूर-दूर तक मखमली कालीन सी पसरी कत्यूर घाटी व उसके ऊपर हिमालय के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी कहानियों व शाम के समय सुनायी देने वाली आरती की स्वर लहरियों ने गुसाईं दत्त को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था। क्योंकि जन्म के छ: घण्टे बाद ही इनकी माँ का निधन हो गया था, इसीलिए प्रकृति की यही रमणीयता इनकी माँ बन गयी। प्रकृति के इसी ममतामयी छांव में बालक गुसाईं दत्त धीरे-धीरे यहां के सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से काग़ज़ में उकेरने लगा। पिता ‘गंगादत्त’ उस समय कौसानी चाय बग़ीचे के मैनेजर थे। उनके भाई संस्कृत व अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे, जो हिन्दी व कुमाँऊनी में कविताएं भी लिखा करते थे। यदाकदा जब उनके भाई अपनी पत्नी को मधुर कंठ से कविताएं सुनाया करते तो बालक गुसाईं दत्त किवाड़ की ओट में चुपचाप सुनता रहता और उसी तरह के शब्दों की तुकबन्दी कर कविता लिखने का प्रयास करता। बालक गुसाईं दत्त की प्राइमरी तक की शिक्षा कौसानी के ‘वर्नाक्यूलर स्कूल’ में हुई। इनके कविता पाठ से मुग्ध होकर स्कूल इंसपैक्टर ने इन्हें उपहार में एक पुस्तक दी थी। ग्यारह साल की उम्र में इन्हें पढा़ई के लिये अल्मोडा़ के ‘गवर्नमेंट हाईस्कूल’ में भेज दिया गया। कौसानी के सौन्दर्य व एकान्तता के अभाव की पूर्ति अब नगरीय सुख वैभव से होने लगी। अल्मोडा़ की ख़ास संस्कृति व वहां के समाज ने गुसाईं दत्त को अन्दर तक प्रभावित कर दिया। सबसे पहले उनका ध्यान अपने नाम पर गया। और उन्होंने लक्ष्मण के चरित्र को आदर्श मानकर अपना नाम गुसाईं दत्त से बदल कर ‘सुमित्रानंदन’ कर लिया। कुछ समय बाद नेपोलियन के युवावस्था के चित्र से प्रभावित होकर अपने लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये।

कवि की साहित्यिक चेतना
पंत जी की साहित्यिक चेतना बेजोड़ है। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रत्येक कण स्वयं को सजीव पाता है। वे स्वयं कहते हैं- “यहीं हैं मेरे तन, मन, प्राण, / यही हैं ध्यान, यही अभिमान; / धूलि की ढेरी में अनजान / छिपे हैं मेरे मधुमय गान !” यही कारण है कि इन्हें न केवल हिंदी साहित्य में बल्कि भारतीय साहित्य में प्रकृति का सुकुमार कवि तथा बेजोड़ कवि माना जाता है। वे प्रकृति को अपनी मुट्ठी में बाँधने का भरसक प्रयास करते हैं। वे कहते हैं- “ऐसे सोने के साँझ प्रात / ऐसे चाँदी के दिवस रात / ले जाती बहा कहाँ गंगा / जीवन के युग क्षण किसे ज्ञात?”

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। 1918 के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। 1926-27 में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन “पल्लव” प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये।

वे 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। “वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। उनकी कविता विरह प्रसूत है। वे कहते हैं-“वियोगी होगा पहिला कवि,/आह से उपजा होगा गान; /उमड़ कर आँखों से चुपचाप/वही होगी कविता अनजान!” “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखर स्वरों की उद्घोषणा करती है। वे निर्जीवों के स्थान पर सजीव की पूजा करना चाहते हैं। गरीब, बेघर, निस्सहाय लोगों को छोड़कर शवों (ताजमहल) का गुणगान करना अनुचित है। वे ताजमहल पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं- “हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन? /जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन! /संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन, /नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन? ” वे नारी को परम वंदनीय मानते थे। उनका काव्य आज की ‘निर्भया’ अथवा ‘दिशा’ को देवी के रूप में देखता था। वे कहते हैं- “यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर, / दल पर दल खोल हृदय के अस्तर / जब बिठलाती प्रसन्न होकर / वह अमर प्रणय के शतदल पर!”
उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पड़ाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। 1908 से 1918 के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ “वीणा” में संकलित हैं। सन् 1922 में “उच्छवास” और 1928 में “पल्लव” का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि।

पुरस्कार/सम्मान
पंत जी हिंदी साहित्य के प्रथम ऐसे कवि हैं जिन्हें ज्ञानपीठ सम्मान से सन् 1968 में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें “चिदम्बरा” काव्य सृजन के लिए दिया गया था। “लोकायतन” के लिये सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिये उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया।

कौसानी : हिंदी साहित्य का तीर्थस्थल
उत्तराखंड राज्य के अल्मोडा जिले के कौसानी गाँव में महाकवि पंत की जन्म स्थली को सरकारी तौर पर अधिग्रहीत कर उनके नाम पर एक राजकीय संग्रहालय बनाया गया है। इस स्थल के प्रवेश द्वार से लगे भवन की छत पर महाकवि की मूर्ति स्थापित है। वर्ष 1990 में स्थापित इस मूर्ति का अनावरण वयोवृद्ध साहित्यकार तथा इतिहासवेत्ता पंडित नित्यानंद मिश्र द्वारा उनके जन्म दिवस 20 मई को किया गया था। संग्रहालय में महाकवि की स्मृतियाँ संजोई गयी हैं। यहाँ उनकी दैनिक वस्तुएँ जैसे- शॉल, दीपक, पुस्तकों की अलमारी तथा महाकवि को समर्पित कुछ सम्मान-पत्र, पुस्तकें तथा हस्तलिपि सुरक्षित हैं।

मृत्यु अंत नहीं आरंभ है
पंत जी मृत्यु को जीवन का नग्न सत्य मानते थे। इसीलिए मृत्योपरांत वे अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों से आग्रह करते हैं-
“जाँति-पाँति की कड़ियाँ टूटे / मोह, द्रोह, मत्सर छूटे। / जीवन के वन निर्झर फूटे, / वैभव बने पराभव।“
जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन कवि पंत जी की सच्ची पुण्यतिथि मानी जाएगी।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://hi.wikipedia.org/s/glu8)

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