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पशुओं के स्वास्थ के प्रति संवेदनशीलता की जरुरत

भारत में पशुओं को धन और शक्ति की संज्ञा दी गयी है। मशीनी युग के बावजूद भी विभिन्न कृषि कार्यों में इनकी उपयोगिता बरकरार है। हल चलाने से लेकर सिंचाई करने, पटेला चलाने, बोझा ढोने, गन्ना पेरने, अनाज से भूसे को अलग करने, कृषि उपज को मंडी ले जाने आदि अनेक कृषि कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है। इसके अलावा भूमिहीन, लघु व सीमांत किसान बड़े पैमाने पर पशुपालन करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आमदनी होती है। लेकिन यह चिंताजनक है कि देश में पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर संवेदनशीलता की भारी कमी है जिसके कारण उनकी तादाद में लगातार कमी आ रही है। आंकड़ों पर गौर करें 1947 से लेकर 1992 तक मवेशियों की संख्या में इजाफा हुआ लेकिन उसके बाद उनकी संख्या में आनुपातिक गिरावट आयी है। एक आंकड़ें के अनुसार 1951 में मवेशियों की संख्या 155.3 लाख थी जो वर्ष 1992 में बढ़कर 204.58 लाख हो गयी। लेकिन 1997 में यह संख्या घटकर 198.88 और वर्ष 2003 में 185.18 लाख तक रह गयी। वर्ष 2017 में इनकी संख्या में जरुर मामूली इजाफा हुआ है लेकिन यह संतोषजनक नहीं है। अच्छी बात यह है कि केंद्र की सरकार एवं कुछ अन्य राज्य सरकारें पशुओं के स्वास्थ्य और संरक्षण को लेकर चिंतित हैं। गत वर्ष केंद्र सरकार ने देशी गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन की शुरुआत की। इस योजना के तहत बड़े शहरों के आसपास लगभग एक हजार गायों को एक साथ रखा जा सकेगा। इनमें 60 फीसद देशी दुधारु गायों और 40 फीसदी बिना दुध देने वाली गायें होंगी। इन गायों को पालन-पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जाएगा तथा समय-समय पर इनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी। गोकुल ग्राम प्रबंधन की गोपालन को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यहां जो दुध का उत्पादन होगा उसका सही तरीके से जांच की जाएगी और वैज्ञानिक तरीके से भंडारण किया जाएगा। साथ ही गाय के गोबर से जैविक उत्पाद तैयार किया जाएगा। गोकुल ग्रामों में बायो गैस स्थापित किए जाने की भी योजना है जिससे कि बिजली की सुविधा मिल सके। इसके अलावा सरकार ने जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर समेकित रुप से देशी नस्ल के पशुओं के विकास के लिए कामधेनु प्रजनन केंद्र की स्थापना की योजना बनायी है जो सराहनीय कदम है। निश्चित रुप से इस योजना से मवेशियों का संरक्षण होगा और उनकी तादाद बढ़ेगी। अच्छी बात यह है कि राज्य सरकारें भी इस दिशा में पर्याप्त कदम उठा रही हैं। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देशी गायों को बढ़ावा देने के लिए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, गोवा और ओडिशा जैसे राज्यों में सकारात्मक पहल की जा रही है। यूपी सरकार द्वारा पशुपालकों को पशुओं की सेहत की निगरानी के लिए पशु स्वास्थ्य कार्ड दिया जा रहा है। इसके साथ ही पशु के शरीर में विशिष्ट पहचान संख्या वाले टैग लगाए जाने की भी योजना है। निःसंदेह इस पहल से पशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी हो सकेगी और उसका लाभ पशुपालाकों एवं देश दोनों को मिलेगा। गौर करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का कितना विशेष महत्व है इसी से समझा जा सकता है कि सकल घरेलू कृषि उत्पाद में पशुपालन का 28-30 प्रतिशत हिस्सा है।यहां ध्यान देना होगा कि छोटे, भूमिहीन तथा सीमांत किसान जिनके पास फसल उगाने एवं बड़े पशु पालने के अवसर सीमित हैं, छोटे पशुओं जैसे भेड़-बकरियां, सूकर एवं मुर्गीपालन रोजी-रोटी का साधन व गरीबी से निपटने का आधार है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत का स्थान बकरियों की संख्या में दूसरा, भेड़ों की संख्या में तीसरा और कुक्कुट संख्या में सातवां है। कम खर्चे, कम स्थान और कम मेहनत से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए छोटे पशुओं का अहम योगदान है। अगर इनसे संबंधित उपलब्ध नवीनतम तकनीकों का प्रचार-प्रसार किया जाए तो निःसंदेह ये छोटे पशु गरीबों के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन यह तभी संभव होगा जब सरकार इस दिशा में सकारात्मक पहल करेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। देश की तकरीबन 70 प्रतिशत आबादी कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है। छोटे एवं सीमांत किसानों के पास कुल कृषि भूमि की 30 प्रतिशत जोत है। इसमें 70 प्रतिशत कृषक पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं जिनके पास कुल पशुधन का तकरीबन 80 प्रतिशत भाग मौजूद है। यानी स्पष्ट है कि देश का अधिकांश पशुधन आर्थिक रुप से निर्बल वर्ग के पास है। इस समय भारत में लगभग 19.91 करोड़ गाय, 10.53 करोड़ भैंस, 14.55 करोड़ बकरी, 7.61 करोड़ भेड़, 1.11 करोड़ शूकर तथा 68.88 करोड़ मुर्गी का पालन किया जा रहा है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र में जहां हम मात्र 1-2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त कर रहे हैं वही पशुपालन से 4-5 प्रतिशत। अगर लोगों में पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़े तो भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन का योगदान बढ़ेगा। पशुपालन से पर्यावरण पर सकारात्मक असर पड़ेगा तथा कृषि कार्य में प्रयुक्त डीजल की खपत में कमी आने से वायुमंडल में प्रदूषण कम होगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। लेकिन यह तभी संभव होगा जब पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीता बढ़ेगी।

 

रीता सिंह

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