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मां दिवस को सार्थक बनाने की जरुरत

आज मां दिवस है। प्रत्येक वर्ष मई माह के दूसरे रविवार को मां दिवस मनाया जाता है। सबसे पहले ग्रीक और रोमन लोगों द्वारा मां दिवस मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। वर्ष 1972 में जूलिया वार्ड हौवे जो कि एक कवि, कार्यकर्ता और लेखक थे, के विचारों द्वारा आधिकारिक कार्यक्रम के रुप में संयुक्त राज्य अमेरिका में मां दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। भारतीय संदर्भ में मां का दर्जा सर्वोपरि है। वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृति और धर्मशास्त्र सभी ग्रंथों में मां की महिमा का गुणगान किया गया है। माता और मातृभूमि को स्वर्ग से बढ़कर कहा गया है। लेकिन बिडंबना है कि सभी धर्मग्रंथों में मां को पूजनीय तो माना गया है लेकिन स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे पर उनकी स्थिति बेहद दयनीय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा जारी रिपोर्ट पर गौर करें तो शिशु को जन्म देते वक्त दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में 17 प्रतिशत माताओं की मौत अकेले भारत में होती है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रसव के दौरान हर घंटे पांच माताओं की जान जाती है। इनमें 30 प्रतिशत मौत रक्तस्राव, 19 प्रतिशत एनीमिया, 16 प्रतिशत संक्रमण, 10 प्रतिशत जटिल व जोखिम वाले प्रसव एवं 8 प्रतिशत मृत्युदर उच्च रक्तचाप संबंधी विकारों से होती है। यह स्थिति तब है जब देश में माताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा के निमित्त जननी सुरक्षा योजना के अलावा कई अन्य योजनाएं चलायी जा रही हैं। इन जागरुकता कार्यक्रमों के बावजूद भी आज गांवों में 43 प्रतिशत प्रसव बेहद खतरनाक स्थिति में घरों में कराए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की पापुलेशन फंड-इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में 50 प्रतिशत और राजस्थान में 41 प्रतिशत से ज्यादा माताओं ने अपने घरों में शिशुओं को जन्म दिया। देश के अन्य राज्यों की हालात भीऐसी ही है। इससे न सिर्फ माताओं की जान जोखिम में पड़ रही है बल्कि वे खतरनाक बीमारियों की चपेट में भी आ रही हैं। किसी से छिपा नहीं है कि देश भर के अस्पतालों में डाॅक्टरों की भारी कमी है। जहां डाॅक्टर हैं वहां दवा नहीं है और जहां दवा और चिकित्सकीय उपकरण हैं वहां डाॅक्टर नहीं है। एक आंकड़े के मुताबिक दवा और उचित इलाज के अभाव में 20 वर्ष से कम उम्र की 50 प्रतिशत माताएं प्रसव के दौरान ही दम तोड़ देती हैं। इसी तरह अस्पतालों में चिकित्सीय उपकरणों की भारी कमी और डाक्टरों की हीलाहवाली से तकरीबन 10 से 15 प्रतिशत माताएं काल के गाल में समा जाती हैं। सेव द चिल्ड्रेन संस्था की मानें तो भारत मां बनने के लिहाज से सबसे खराब देशों में शुमार है। देश के जिन हिस्सों में भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और जागरुकता की कमी है, वहां प्रसव के दौरान सर्वाधिक माताओं की मृत्यु होती है। कम उम्र में लड़कियों का विवाह भी मातृत्व मृत्यु दर में वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण है। दरअसल कम उम्र में विवाह के कारण लड़कियां शीध्र ही मां बन जाती हैं जिससे उनमें खतरनाक बिमारियां पनपती हैं। साथ ही उनका जान जाने का खतरा भी बना रहता है। माताओं की सुरक्षा की बात करें तो देश में घरेलू हिंसा, बलात्कार, कन्या भ्रुण हत्या, दहेज-मृत्यु, अपहरण और अगवा, लैंगिक दुव्र्यवहार और आॅनर कीलिंग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने के बावजूद भी प्रतिदिन 100 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है और 364 से अधिक महिलाएं यौन शोषण का शिकार होती हैं। माताओं के साथ परिजनों का हिंसक व्यवहार के संबंध में यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ बताती है कि देश में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 प्रतिशत माताएं ऐसी होती हैं जो अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेलती हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली 77 प्रतिशत माताएं कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार बनती हैं। इसी तरह 15 साल से 19 साल की उम्र वाली लगभग 21 प्रतिशत माताएं 15 साल की उम्र से ही हिंसा झेलने को मजबूर होती हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च आॅन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से भी उद्घाटित हो चुका है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 52 प्रतिशत माताओं ने स्वीकार किया है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसी तरह 38 प्रतिशत माताओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकार चुकी है। गौर करें तो माताएं ज्यादती का ही शिकार नहीं होती हैं बल्कि वे लैंगिक भेदभाव की भी शिकार बनती हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर के कई देशों में महिलाओं की आर्थिक उन्नति में कानूनी बाधाएं हैं जिसके कारण उन्हें नौकरियां छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इतना ही नहीं कम से कम 18 देशों में तो माताओं को नौकरी करने के लिए अपने पति से मंजूरी लेनी पड़ती है। रोजगार के मामले में भी माताओं के साथ भेदभाव सामने आ चुका है। यह पर्याप्त नहीं कि देश व समाज मां दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें करे, भाषण दे व सेमिनारों के जरिए मां दिवस पर रस्म अदायगी करे। इसी दिखावटी रस्म अदायगी का ही नतीजा है कि आजादी के सात दशक बाद भी माताओं की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। यहां समझना हेागा कि मां दिवस की सार्थकता तब फलित होगी जब वे स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध होंगी। 

 

रीता सिंह

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