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मानवता के मसीहा निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज

एकत्व में सद्भाव’ और ‘दीवार रहित संसार’ की अवधारणा से मानवता को सुन्दर देन देने वाले निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी महाराज का जीवन मानव मात्र के कल्याणार्थ समर्पित रहा। जो भी एक बार उनके सम्पर्क में आया वह उन्हीं का हो कर रह गया। उन्होंने जीवन पर्यन्त प्रेम और शान्ति का पाठ पढ़ाया और धरती पर बसने वाले प्रत्येक मानव को जागरूकता प्रदान की और फ़रमाया की प्रभु की अनुभूति करके ही विश्व में आदर्श मानव समाज की स्थापना की जा सकती है
परम पूज्य बाबा हरदेव सिंह जी का जन्म 23 फरवरी, 1954 को निरंकारी कालोनी दिल्ली में बाबा गुरबचन सिंह जी और राजमाता कुलवन्त कौर जी के घर में हुआ। आपको बचपन से ही दिव्य-संस्कार तथा आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त हुई। बाबा हरदेव सिंह जी ने प्रारम्भिक शिक्षा रोज़री पब्लिक स्कूल, दिल्ली; माध्यमिक शिक्षा यादवेन्द्र पब्लिक स्कूल, पटियाला एवं उच्चत्तर शिक्षा दिल्ली में प्राप्त की।
सत्संग, सेवा, सुमिरण के साथ-साथ आप मिशन के सामाजिक- आध्यात्मिक कार्यों में गहरी रुचि लेते थे। पांच भाई- बहनों में आपके अलावा चार बहनें निरंजन जी, मोहिनी जी, जगजीत जी एवं बिंदिया जी हैं।
सन् 1971 में, आप सन्त निरंकारी सेवादल के सदस्य बने। सन् 1975 में आपने ‘निरंकारी यूथ फोरम’ की स्थापना की जिसके आप इस फोरम के अध्यक्ष भी रहे।
सन् 1975 में दिल्ली में आपका विवाह फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) के श्री गुरुमुख सिंह जी और श्रीमती मदन जी की सुपुत्री सविन्दर जी से हुआ, जिन्हें वर्तमान में निरंकारी सद्गुरु माता सविन्दर हरदेव जी के रूप में सत्कार दिया जाता है। आपकी तीन सुपुत्रियाँ हैं- समता जी, रेणुका जी एवं सुदीक्षा जी।
24 अप्रैल, 1980 को बाबा गुरबचन सिंह जी के बलिदान के उपरान्त बाबा हरदेव सिंह जी सद्गुरु रूप में प्रकट हुए और उद्वेलित सन्त समाज के अतृप्त हृदयों को अपनी अलौकिक दिव्य वाणी से शान्त किया। बाबा हरदेव सिंह जी ने अपने उद्बोधन में फरमाया था – “आज हम कहते हैं कि उनकी हत्या कर दी गई है। यह उनकी हत्या नहीं हुई, बल्कि “तेरे भाणे सरबत का भला” के विचारों की हत्या हुई है। यह भाई कन्हैया जी की भावना की हत्या हुई है। बाबा गुरबचन सिंह जी को कोई मार नहीं सकता।”
किसी भी प्रकार की बदले की भावना को त्यागकर आपने मिशन के अनुयायियों को दया, सद्भाव, प्रेम और सत्य के संदेश को प्रसारित करने का आह्वान किया और प्रत्येक मानव के भले की कामना की। निरंकारी राजमाता जी ने अपने जीवन के अंतिम स्वांस तक कदम-कदम पर आपका साथ निभाया। देश ही नहीं अपितु विश्व कल्याण यात्राओं में भी सहभागी रहीं।
मानव एकता की स्थापना का भाव आपके हृदय में इतना सुदृढ़ था कि वर्ष 1981 में सद्गुरु बाबा गुरबचन सिंह जी की याद को समर्पित समागम को आपने ‘मानव एकता दिवस’ का स्वरूप प्रदान कर दिया। तब से हर वर्ष यह दिवस इसी रूप में मनाया जाता है।
वर्ष 1986 में आपने मानवता को एक नई दिशा प्रदान की। ‘रक्त नालियों में नहीं, नाड़ियों में बहना चाहिए’ आपके इस सन्देश को निरंकारी श्रद्धालुओं ने हृदय की गहराईयों से स्वीकार किया और तब से निरंतर हर वर्ष विश्व भर में रक्तदान किया जाता है और अब तक साढ़े आठ लाख यूनिट से अधिक रक्तदान करने का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्ष 2016 में मुम्बई में प्रथम ब्लड-बैंक का आपके द्वारा उद्घाटन किया गया जो बाबा गुरबचन सिंह जी के स्वप्न को ही साकार करता है।
सत्य के प्रचार को व्यवस्थित रूप से विश्व में प्रसारित करने के उद्देश्य से वर्ष 1987 में एक कान्फ्रेन्स आयोजित कर आपने बाबा गुरबचन सिंह जी द्वारा मसूरी में लिये गये निर्णयों को उनके मूल स्वरूप में क्रियान्वित करने पर बल दिया। तदोपरान्त 1997 एवं 2002 में आपने विशेष जनरल बॉडी मीटिंग्स का आयोजन कर मिशन के प्रबन्धकों एवं प्रचारकों को मिशन के सिद्धान्तों को अपनाते हुए ‘प्रचार एवं प्रबन्ध व्यवस्था’ सम्बन्धी निर्णयों को पूर्ण रूप से पालन करने की प्रेरणा दी।
पर्यावरण की शुद्धता के प्रति मानव-मात्र को जागरूक करने के लिए आपने ‘प्रदूषण अन्दर हो या बाहर दोनों हानिकारक है’ का न केवल सन्देश दिया बल्कि देश-विदेश में वृक्षारोपण एवं स्वच्छता अभियान की शुरुआत कर इसे क्रियान्वित रूप भी प्रदान किया। तब से आपके जन्म दिवस 23 फरवरी को विश्व भर में स्वच्छता अभियान निरंतर जारी है।
जनरल बॉडी की विशेष मीटिंग में 20-21 मार्च 1997 को प्रचार एवं प्रबन्ध व्यवस्था सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये। प्रचार-प्रसार को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने हेतु ‘आचार संहिता’ के स्थान पर ‘कार्य प्रणाली’ नामक दिशा-निर्देशों से सम्बन्धित पुस्तक प्रकाशित किया गया।
28 व 29 मार्च 2002 को दिल्ली में विशेष जनरल बॉडी मीटिंग आयोजित की गई जिसमें ‘प्रचार व प्रबन्ध व्यवस्था-2002’ पुस्तक प्रकाशित करने का निर्णय हुआ तथा पहली बार एक महिला को कार्यकारिणी समिति में शामिल किया गया। इसी वर्ष पहली बार गुरु पूजा दिवस 23 फरवरी को मनाया गया।
सद्गुरुदेव जी के 50 वें जन्म दिवस पर भव्य गुरु पूजा दिवस समारोह दिल्ली में 22 व 23 फरवरी 2004 को आयोजित किया गया जिसमें सूफी गायकों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। यह सिलसिला अत्यन्त उत्साहपूर्वक जारी रहा और गुरु पूजा दिवस पर दिल्ली आने वाली संगतें लगातार बढ़ती चली गईं।
फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में 26 सितम्बर 2007 को 27 देशों की यूरोपियन संसद ने सद्गुरु बाबा जी का भव्य स्वागत किया उनको सार्वभौमिक रूप में स्वीकार किए जाने का प्रमाण है।
समय की आवश्यकता को देखते हुए वर्ष 2009 में सन्त निरंकारी मिशन के प्रबन्धकीय ढांचे को नया स्वरूप प्रदान किया और केन्द्रीय योजना व सलाहकार बोर्ड तथा सन्त निरंकारी चैरिटेबल फाउण्डेशन की स्थापना की।
बाबा जी के जन्म दिन, गुरु पूजा दिवस पर 23 फरवरी 2009 को देश एवं दूर-देशों में पहली बार सफाई अभियान चलाया गया। इसके अगले वर्ष वृक्षारोपण अभियान भी आरम्भ कर दिया गया। इस वर्ष 263 रेलवे स्टेशनों की सफाई के साथ-साथ विश्वव्यापी सफाई अभियान ने सभी को प्रभावित किया। सद्गुरु माता जी ने हरियाणा के चार गांवों को गोद लेकर उनकी साफ-सफाई व अन्य ग्रामोत्थान कार्यों को आगे बढ़ाया जो सरकार से अलग आध्यात्मिक-सामाजिक संस्थाओं के लिए अनूठा व अनुकरणीय उदाहरण के रूप में सामने आया।
बाबा अवतार सिंह जी द्वारा स्थापित निरंकारी सरोवर परिसर को आपने अपने समय में ऐसा सुन्दर स्वरूप प्रदान किया कि यह स्थल दिल्ली सरकार ने अपने पर्यटन मानचित्र में शामिल कर लिया है। मिशन के आरम्भ से अब तक की गतिविधियों एवं विस्तार को दर्शाने हेतु इसी परिसर में आधुनिक तकनीक पर आधारित ‘दिव्य-यात्रा संग्रहालय’ (Divine Journey Museum) स्थापित किया।
विश्व में एकत्व के भाव को साकार करते हुए आपने इसी परिसर में भव्य संगीतमय ‘एकत्व के फव्वारे’ का निर्माण करवाया जो जनसाधारण के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ रोज बड़ी संख्या में लोग यहां आकर आनन्दित होते हैं।
सत्य के प्रचार-प्रसार हेतु आपने हर उस साधन का प्रयोग किया जो समय की आवश्यकता के अनुरूप उपलब्ध हुआ। मिशन द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्य को नया स्वरूप प्रदान किया।
युवा वर्ग को अध्यात्म की धारा से जोड़ने के लिए आप निरंतर प्रयासरत रहे। आपके दिव्य व्यक्तित्व, सकारात्मक विचारधारा, विश्व-भ्रातृभाव एवं मानव कल्याण हेतु किये जाने वाले कार्यों के लिए न केवल भारतवर्ष में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में आपको सम्मानित किया गया। जहाँ यूरोपियन पार्लियामेंट द्वारा आपको आमंत्रित कर सम्मानित किया वहीं गाँधी ग्लोबल फैमिली द्वारा आपको ‘महात्मा गाँधी सेवा मेडल’ से सुशोभित किया गया। वर्ष 2015 में बर्मिघम (इंग्लैण्ड) में समाज सेवा हेतु आपके मार्गदर्शन में दिये जा रहे योगदान के लिए इंग्लैण्ड के सर्वोच्च सम्मान ‘क्वीन्स अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। सन्त निरंकारी मिशन द्वारा सामाजिक एवं आध्यात्मिक दिशा में दिये जा रहे उल्लेखनीय योगदान को दृष्टिगत रखते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) ने मिशन को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया।
मिशन की शिक्षाओं को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित- प्रसारित करने के उद्देश्य से आपने वर्ष 2012 में बर्मिंघम (इंग्लैण्ड) में अन्तर्राष्ट्रीय निरंकारी समागम का आयोजन करवाया। इसी लड़ी को आगे बढ़ाने के लिए गत वर्ष आपने टोरांटो (कनाडा) में दूसरा निरंकारी अन्तर्राष्ट्रीय समागम वर्ष 2016 में आयोजित करने की घोषणा की। इसी समागम की तैयारियों को देखने के लिए 13 मई, 2016 को जब आप अमेरिका के न्यूयॉर्क से कनाडा के मांट्रियल जा रहे थे तब एक सड़क दुर्घटना में आपने भारतीय समयानुसार प्रातः 5 बजे अपना नश्वर शरीर त्याग दिया और निरंकार में विलीन हो गये। इसी दुर्घटना में आपके समर्पित भक्त व दामाद श्री अवनीत सेतिया जी भी  ब्रह्मलीन हो गए। बाबा जी के रूप में विश्व ने एक दिव्य-व्यक्तित्व को खो दिया है जो जीवन भर प्रेम-शान्ति, मानवता व सद्भाव का संदेश देता रहा।
आपने वर्ष 1980 से 2016 तक 36 वर्षों तक सद्गुरु रूप में सन्त निरंकारी मिशन एवं विश्व को दिव्य मार्गदर्शन प्रदान किया। आपकी अगुवाई में मिशन न केवल आध्यात्मिकता के प्रचार-प्रसार के शिखर पर पहुँचा बल्कि समाज-सेवा के क्षेत्र में भी अग्रणी होने का गौरव हासिल किया। आपने मानव जीवन के हर पहलू विशेषतः पारिवारिक स्नेह व समन्वय, शैक्षिक स्तर में उन्नति, समाज में मानवीय मूल्यों की स्थापना एवं विश्व-बन्धुत्व की भावना को साकार करने हेतु सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त करने का सफल प्रयास किया और एकत्व भाव से युक्त ‘दीवार रहित संसार’ के सृजन की दिशा में अग्रसर रहे। यद्यपि बाबा हरदेव सिंह जी महाराज साकार रूप में आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन आपकी शिक्षाएं रहती दुनिया तक मानव-मात्र का मार्गदर्शन करती रहेंगी।
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