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भूखे भजन न होई गोपाला

भूख का नाम सुनते ही एक तरह की तड़प का ख्याल आपको भी आता ही होगा न , एक ऐसी तड़प का जहां पेट सन्न पड़ जाते ही होंगे , होंठ सूख जाते हैं, हमारा  दिमाग ही  काम करना बंद कर देता है ,साथ ही सांस का भीतर आना जाना मुश्किल हो जाता है । हालात जिंदगी को अलविदा कहने वाले हो जातें है , इसलिए भूख के साथ भुखमरी का एहसास भूख बोलते ही आ जाता है,इसलिए जरा सोच कर देखिए कि जिस परिवार में दो जून की भूख मिटाने के लिए हर रोज लड़ना पड़ता होगा उनका दुनिया के किसी भी दूसरे इंसान से किस तरीके का व्यवहार हो सकता है, जवाब आसान है चाहे जैसा मर्जी वैसा व्यवहार हो लेकिन वैसा तो नहीं होगा जैसा दो लोगों के बीच होना चाहिए ,इसलिए भूख से लड़ना दुनियां की अहम जिम्मेदारियों में से एक कल भी था आज भी जब हम विश्व गुरु बनने की बाते कर रहे है।हमारे संविधान का  अनुच्छेद 47 कहता है कि राज्य अपनी जनता के पोषण और रहन सहन का स्तर बढ़ाने के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य में बेहतरी को अपना मुख्य कर्तव्य मानेगा,  वैसे देखे तो आजादी मिलने के समय से ही खाद्य सुरक्षा हमारे देश का एक बड़ा लक्ष्य रहा है , ऐसा इसलिए भी कि बंगाल के सूखे ने भुखमरी दूर किए जाने की जरूरत की दिशा में जागरूकता फैलाई थी , आजादी के बाद हमारे देश के पास पोषण संबंधी पहला समस्या तो अकाल और इसी के कारण ही खाद्यान्न  के कम उत्पादन के कारण भूखमरी की स्थिति जबकि वहीं दूसरी समस्या उचित वितरण प्रणाली की कमी थी जो कि आज भी यथावत है , एक और चुनौती गरीबी खाद्य सुरक्षा और पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण लंबे समय से चली आ रही कुपोषण को लेकर भी थी ।अगर हम वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देखें तो हमारे भारत की आबादी 1.2 अरब थी , जो कि वर्ष 2030 तक बढ़कर लगभग 1.6 अरब से भी ज्यादा हो जायेगी, इस तरह से हम दुनियां में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएंगे, वर्तमान में ही देखे तो इस आंकड़े के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी में हमारे भारत की जनसंख्या का हिस्सा 17 प्रतिशत से भी ज्यादा है , लिहाजा नीतियों को देखते हुए कह सकते हैं कि सभी के लिए खाद्य और पोषण संबंधित सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है । आप ही देखो ना विश्वगुरु बनने की चाह रखने वाले हमारे भारत का ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार 2020 में दुनिया भर के 107 देशों में से भारत 27.2 स्कोर के साथ 94वें रैंक पर है, इससे तो साफ है ही  कि जिन 107 देशों का डेटा पिछले  साल साझा किया गया है, उनमें से मात्र 13 देशों में भूख की वजह से लोग भारत से ज्यादा परेशान हैं , उस पर से कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना जिसके कारण बहुतों का रोजगार , काम धंधे सभी बंद पड़े हैं, इससे  तो और ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार हो ही रहे है ,लेकिन सरकारें लोक कल्याणकारी योजनाओ को लागू कर भी रही है तो बिचौलिए  गरीबों के रोटी पर डंका डाल दे रहे है ,हमने देखा की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कितना धांधली हुआ, बहुत से लोगों का तो लाइसेंस रद्द किया गया लेकिन बहुत  से सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सरकार के नुमाइंदों से मिलीभगत के कारण उनकी दुकानें चलती रही । देखे आंकड़े तो भारत की तकरीबन 15 फ़ीसदी आबादी को उतना भोजन नहीं मिलता जितनी भोजन की उसे हर रोज जरूरत होती है, 5 साल से कम उम्र के तकरीबन 18 फ़ीसदी बच्चों का वजन अपनी लंबाई के हिसाब से कम है। 5 साल से कम उम्र के बीच मृत्यु दर 3 से 4 फ़ीसदी के आसपास है, हालांकि अच्छी खबर है कि साल 2000 के बाद भारत में बच्चों की मृत्यु दर में लगातार गिरावट आई है। साल 2000 में यह 9 से 10 फ़ीसदी के आस पास रहती थी, कम होकर साल 2020 में तीन से चार फीसदी के आस पास आ गई है।वही आज हम देखे तो कुछ लोग हमारे ही देश में कुपोषण का शिकार है तो वही बहुत से लोग ओवरन्यूट्रिशन की समस्याओं से ग्रसित हैं , कहीं ना कहीं कह सकते हैं कि जो हमारे पास संसाधन है उसका वितरण सही प्रकार से नहीं हुआ है, जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि देश के संसाधनों पर सभी का बराबर का हक है, लेकिन आज हम कह सकते हैं कि महामारी हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती नहीं है बल्कि लालच सबसे बड़ी चुनौती है, गांधीजी तो कहा भी करते थे कि इस धरा पर सभी के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद है लेकिन लालची व्यक्ति के लिए संसाधन शायद कम पड़ जाए, आज यही हमारे साथ हो रहे हैं, देखें तो लगभग 90 फ़ीसदी संसाधनों पर 10 फ़ीसदी लोगों का कहीं ना कहीं अधिकार है ,वहीं 10 फ़ीसदी संसाधन पर गरीब और मध्यम वर्ग किसी तरह गुजर बसर कर रहा है, आखिर इतनी ज्यादा गैप कैसे हो सकता है? आप जरूर सोचिएगा , इसीलिए हम बार-बार कहते हैं कि देश के लिए महामारी या वर्तमान में कोरोना जैसे महामारी चिंता का विषय नहीं है बल्कि आज जो लोगों में लालच बढ़ती जा रही है यह चिंता का विषय होनी चाहिए। आज ही आप सोच कर देखो कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी आखिर हमारे देश में खाद्य सुरक्षा सभी के लिए क्यों नहीं हो पाई? वही दूसरी तरफ हम देखते हैं कि हमारा अनाज गोदामों में ऐसे ही सड़ जाता है, तो कहीं ना कहीं हमारे अन्नदाता दिन-रात खेतों में मेहनत करके इंसान को पालने के लिए जरूरत से भी ज्यादा अनाज उत्पन्न तो कर रहे हैं लेकिन भंडारण और सरकारों की  क्रियान्वयन प्रक्रियाओं में कमी के कारण अनाज सड़ जा रहा है ,और गरीब भूखे मर रहा है। याद रखना किसी भी राष्ट्र को संपूर्ण रूप से विकसित होने के लिए उस राष्ट्र के युवा के साथ ही सभी वर्गों को स्वस्थ और शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है, सेहतमंद लोग देश के विकास में योगदान देते हैं,साथ  ही सरकार को अवसंरचना संबंधी और अन्य सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाना चाहिए, वैसे सेहतमंद भारत सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाते वक्त पिछले वर्ष सरकार ने देश के नागरिकों की वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा पक्का करने के लिए भी कई कदम उठाए हैं, इसके साथ ही मजबूत और अवसंरचना के लिए उठाए गए कदम और स्वच्छ भारत स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे अभियान का क्रियान्वयन सही तरीके से हो तो निश्चित तौर पर भारत को दुनिया के नक्शे पर आगे की पंक्ति में लाकर खड़ा किया जा सकता है, लेकिन सबसे पहले अपने युवाओं पर काम करना होगा, युवाओं को रोजगार मुहैया कराना होगा, कहते भी  है ना की किसी भी राष्ट्र का युवा खत्म तो वह राष्ट्र खत्म, तो हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्र निर्माण में युवाओं की प्रमुख भूमिका होती है, साथ ही हमें अपने अन्नदाता पर विशेष आज ध्यान देने की जरूरत है, आप सभी से भी आज हम यहां विनम्र निवेदन करते हैं 05 से 10 मिनट अपनी री घंटे में से जरूर निकालें युवाओं को प्रेरित करने के लिए उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए, साथ ही अपने सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंद अन्नदाता और युवाओं के साथ ही जो  भी जरूरतमंद हो उनका आगे बढ़कर जरूर मदद करें,कही हमने पढ़ा था की मरहम लगा सको तो किसी गरीब के ज़ख्मो पर लगा देना ,हकीम बहुत हैं बाज़ार में अमीरों के इलाज़ के खातिर ।
 विक्रम चौरसिया
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