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देश को भड़काऊ नहीं, भारी भरकम नेतृत्व की दरकार

जनता को भड़का और बरगला कर अपनी राजनीति चमकाने में लगे तमाम दलों के नेताओं/नेतृत्व को यह नहीं भूलना चाहिए की स्वार्थ की सियासत और काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। नेता और नेतृत्व वो ही श्रेष्ठ होता है जो समय और परिस्थितियों के अनुकूल चलता और निर्णय लेता है। किसी नेता को यह नहीं समझना चाहिए कि जनता बेवकूफ होती है, उसे जैसे भी ‘नचाया-घुमाया’ जा सकता है। जनता बहुत ज्यादा बोलती भले नहीं हो परंतु वह पल-पल अपने नेताओं पर नजर और उनका हिसाब रखती है। अच्छा नेता कभी इस बात को नहीं भूलता है। नेता तो वह शख्स होता है जो अंततः लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। उनके सुख-दुख में खड़ा रहता है, जो लोग उस पर विश्वास करते हैं या नहीं भी करते हों, उन्हंे सही-गलत का अंतर बताना एक नेता की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। नेता अपनी सूझबूझ से ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है जिसका अनुसरण करके आम आदमी में भी असाधारण कार्य करने की क्षमता विकसित हो जाती है। प्रसिद्ध लेखक ओसवाल्ड स्पैगलर ने अपनी पुस्तक ‘मैन ऐण्ड टेक्निक्स’ में लिखा है कि इस युग में केवल दो प्रकार की तकनीक ही नहीं है वरन् दो प्रकार के इंसान भी हैं, जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में कार्य करने तथा निर्देशन देने की प्रवृति होती है, उसी प्रकार कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी प्रकृति आज्ञा मानने की होती है। यही मनुष्य जीवन का स्वाभाविक रूप है। यह रूप युग परिवर्तन के साथ कितना ही बदलता रहे, किन्तु इसका अस्तित्व तब तक रहेगा जब तक यह संसार रहेगा।
जब सम्पूर्ण नेता की बात होती है तो एक नेता को शासन करने, निर्णय लेने, निर्देशन करने, आज्ञा देने आदि सब में निपुण होना चाहिए। यह एक कठिन तकनीक है। परन्तु सच्चाई यह भी है कि अन्य कलाओं की तरह यह (नेतृत्व करने की क्षमता) भी एक नैसर्गिक गुण है। प्रत्येक व्यक्ति में यह गुण या कला समान नहीं होती है। विद्वानों ने नेतृत्व को भिन्न-भिन्न प्रकार से स्पष्ट किया है। कभी-कभी इसका अर्थ प्रसिद्धि से समझा जाता है। लोकतांत्रिक दृष्टि से इसका अर्थ उस स्थिति से समझा जाता है जिसमें कुछ व्यक्ति स्वेच्छा से दूसरे व्यक्तियों के आदेशों का पालन कर रहे हों। कभी-कभी यदि कोई व्यक्ति शक्ति के आधार पर दूसरों से मनचाहा व्यवहार करवा लेने की क्षमता रखते हो तो उसे भी नेतृत्व के अंतर्गत सम्मलित किया जाता है। वास्तविकता यह है कि नेतृत्व का तात्पर्य इनमें से किसी एक व्यवहार से नहीं है,बल्कि नेतृत्व व्यवहार का वह ढंग होता है जिसमें एक व्यक्ति दूसरों के व्यवहार से प्रभावित न होकर अपने व्यवहार से दूसरों को अधिक प्रभावित करता है। भले ही यह कार्य दबाव द्वारा किया गया है अथवा व्यक्तिगत सम्बंधी गुणों को प्रदर्शित करके किया गया हो।
बहरहाल, देश का यह दुर्भाग्य है कि आजकल उक्त श्रेणी के नेता लुप्तप्राय होते जा रहे हैं। आज ऐसे नेताओ की बाढ़ आ गई है जो जमीनी हकीकत और जनता का मूड दोनों हीं पहचान पाते हैं। इसी लिए तो कोरोना महामारी के आपातकाल में भी कुछ नेता अनाप-शनाप बयानबाजी करके आम जनता, मजदूरों, किसानों, सरकारी कर्मचारियों, व्यापारियों आदि सबको भड़काने में लगे हैं। जनता को भड़काने में लगे कांगे्रस के गांधी परिवार, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, बसपा नेत्री मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित अन्य तमाम नेताओं की बात तो दूर एक पूर्व प्रधानमंत्री तक ने मोदी सरकार को नीचा दिखाने के चक्कर में अपना सियासी कद काफी गिरा लिया है। यह पूर्व प्रधानमंत्री जिस तरह की बयानबाजी कर रहें हैं उससे उनके अर्थशास्त्री होने पर भी लोग संदेह करने लगे हैं,जो प्रधानमंत्री कहा करते थे ‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं’ उन्हें मोदी राज में लगने लगा है कि पैसे पेड़ पर ही उगते हैं। बात कांगे्रस के दिग्गत नेता, अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हो रही है। जब मनमोहन सिंह की उम्र के तमाम दिग्गज कांगे्रसी नेताओं ने राजनीति से अपनी दूरियां बढ़ा ली हैं, तब मनमोहन सिंह, गांधी परिवार को खुश करने के लिए अपनी सीमाएं ही भूल गए हैं। प्रधामनंत्री रहते जिन मनमोहन सिंह को मौनी बाबा का ‘खिताब’ मिला हुआ था,अब वह चुपने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।
कोरोना के कहर से जूझती मोदी सरकार के फैसलों पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस नेतृत्व और उसके दिग्गज नेताओं के द्वारा बार-बार उंगली उठाए जाने से तो यही लगता है कि कांगे्रसियों का मकसद देशहित से अधिक मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करना है। कोरोना काल में कांगे्रसियों का खाली दिमाग, शैतान का घर बन गया है। हद तो तब हो गई जब आपदा की घड़ी में मोदी सरकार ने केन्द्रीय कर्मचारियों का मंहगाई भत्ता रोकने का फैसला लिया तो कर्मचारी तो नाराज नहीं हुआ, लेकिन गांधी परिवार ने प्रलाप करना शुरू कर दिया। केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि न करने के फैसले पर आपत्ति जताते हुए राहुल गांधी तो बुलेट टेªन तक पहुंच गए और फरमाने लगे मोदी सरकार को चाहिए कि कर्मचारियों का मंहगाई भत्ता रोकरने की बजाए बुलेट ट्रेन परियोजना के साथ सेंट्रल विस्टा परियोजना को निलंबित कर दिया जाए। ऐसा कहकर राहुल गांधी न जाने कौन सी होशियारी की बात कर रहे थे। बताते चलें राहुल से पूर्व सोनिया गांधी ने भी पीएम मोदी को पत्र लिखकर कहा था कि कोरोना संकट को देखते हुए सरकारी खर्च में 30 फीसदी की कटौती की जाए और ‘सेंट्रल विस्टा परियोजना’ (जिसके तहत नया त्रिकोणीय संसद भवन, कॉमन केंद्रीय सचिवालय और तीन किलोमीटर लंबे राजपथ को रीडेवलप किया जाना है) को स्थगित कर दिया जाए। पत्र में सोनिया गांधी ने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रियों और नौकरशाहों के विदेश दौरों को स्थगित करने की जरूरत है। अब सोनिया को कौन समझाए कि इस समय मोदी सरकार का खर्चा सबसे निम्न स्तर पर है। आजादी के बाद शायद ही कभी किसी सरकार ने अपने खर्चो में इतनी कटौती की होगी,जितनी मोदी सरकार ने की है। कोरोना के चलते कोई नेता,मंत्री या नौकरशाह के विदेश जाने का सवाल ही नहीं उठता है,इसलिए किसी के विदेश दौरे को स्थगित करने का सवाल ही नहीं खड़ा होता है।इसी पत्र में उन्होंने लिखा था कि सरकारी विज्ञापनों पर भी रोक लगाने की जरुरत है,जिस पर काफी बवाल भी हुआ था। अब कोरोना महामारी से जनता को जागरूक करने के लिए तो सरकार को विज्ञापन देना ही पड़ेगा,इसे अगर सोनिया गांधी फिजूलखर्च समझती हैं तो इस पर क्या कहा जा सकता है।
खैर, बात बुलेट टेªन और ‘सेंट्रल विस्टा परियोजना’और राहुल की समझदारी की कि जाए तो राहुल को ज्ञान देने से पहले थोड़ा ज्ञान ले भी लेना चाहिए। गौरतबल हो, उक्त दोनों परियोजनाओं की घोषणा कोरोना महामारी के दौर में नहीं की गई थी, बुलेट ट्रेन परियोजना पर तो काफी प्रगति भी हो चुकी है। बुलेट टेªन परियोजना को निलंबित करने का मतलब है, उसमें लगाए गए धन और श्रम की बर्बादी। राहुल को ऐसी कोई मांग करते समय इस बात की समझ भी रखना चाहिए कि किसी विकासशील देश के लिए इस तरह की परियोजनाएं रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ-साथ समय की मांग भी होती हैं। जहां तक सेंट्रल विस्टा परियोजना की बात है तो अभी इस परियोजना की मात्र घोषणा ही हुई है। जब सरकार की ओर से ऐसा कुछ कहा ही नहीं जा रहा कि वह कोरोना संकट के बावजूद इस परियोजना पर हर हाल में अमल करेगी तब फिर उस पर आपत्ति जताने और उसे निलंबित करने की मांग का कोई औचित्य नहीं। चूंकि कोरोना का कहर एक बड़ी आपदा है और उससे होने वाले नुकसान का अनुमान लगाना भी कठिन है इसलिए हालात के मुताबिक जरूरी कदम उठाने और उनमें हेरफेर करते रहने की नीति ही उचित है। यह विचित्र है कि राहुल गांधी के साथ-साथ कुछ ऐसी कांगे्रसी नेता भी, जो कांगे्रस के शासनकाल में मंत्री रह चुके थे, किसानों, मजदूरों, कारोबारियों को ज्यादा से ज्यादा राहत देने पर जोर देने के साथ यह भी मांग कर रहे हैं कि मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम भी कम करे। हैरानी यह है कि कांगे्रस के नेताओं ने पेट्रोल-डीजल के दाम कम करने की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट की खबर आते ही कर दी। यह ठीक है कि राहुल गांधी बिना विचारे कुछ भी कह देते हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उनकी हां में हां मिलाते दिख रहे हैं। बेहतर होता कि वह अपनी इस उक्ति का स्मरण करते कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते। उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए था कि किस तरह उनके प्रधानमंत्री रहते राहुल गांधी ने उनकी सरकार द्वारा पास किए एक अघ्यादेश को बेकार साबित करते हुए प्रेस कांफे्रस में फाड़ दिया था।
बहरहाल, सोनिया, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के बयानों को तो यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि यह मोदी विरोध से आगे निकल ही नहीं पा रहे हैं, परंतु यही बात जब पूर्व प्रधामनंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं तो उन्हें ऐसा कहते समय कम से कम यह जरूर बताना चाहिए था कि जो वह चाह रहे हैं उसे करने के लिए सरकार पैसे का प्रबंध कहां से करे? एक अर्थशास्त्री होने के नेत मनमोहन सिंह को मोदी सरकार को रास्ता दिखाते समय पैसा कहां से आएगा, इन स्रोतों के बारे में भी जानकारी दे देना चाहिए था। ऐसी उनके न बताने के बावजूद सरकार को इसकी चिंता करनी ही होगी। चूंकि देश असाधारण परिस्थितियों का सामना कर रहा है, इसलिए चाहें केन्द्र की मोदी सरकार हो या फिर राज्यों की सरकारें सबको कुछ असाधारण फैसले लेने ही पड़ेंगे। इससे जनता को असुविधा हो सकती है। कुछ लोग नाराज और परेशान भी हो सकते हैं,लेकिन देशहित से बढ़कर कुछ नहीं है। इसलिए मोदी विरोधियों को भी जनता को भड़काने की बजाए समझना चाहिए कि यह संकट काल है,इसमें सबको कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा।

अजय कुमार, लखनऊ

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