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अब और तब का रामायण

रामायण के पुनर्प्रसारण से संबंधित लेख


पिता एक बार फिर से टी.वी. पर चलाए जा रहे रामायण धारावाहिक का आनंद उठा रहे थे। उन्हें अपने दिन याद गए। वे अपने बेटे को पास बुलाकर कहने लगे कि जब मैं छोटा था तो रामायण देखने के लिए देश के लोगों में एक अजीब सी खुशी होती थी। 25 जनवरी, 1987 में पहली बार जब रामायण धारावाहिक ने टी.वी. पर पहली बार दस्तक दी तब भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा था। देश भी काफी बदल चुका था। चाहे बात तब की हो या अब की – रामायण का जादू हमेशा बरकरार है। अंतर केवल इतना है कि तब रामायण देखने के लिए लोग सभी काम-धाम छोड़कर टी.वी. से चिपक जाते थे। सड़कों पर कर्फ्यू जैसे हालात हो जाते थे। किंतु अब लोगों को कोरोना वायरस बचाए रखने के लिए घर से बांधे रखना जरूरी है। इसीलिए जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के नाम पर उन्हें बाहर आने से रोका जा रहा है। फिर भी जो लोग बाहर आ रहे हैं उन्हें रोकने के लिए इस धारावाहिक का प्रसारण किया जा रहा है।
बेटा पिता की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसने अपने पिता से कहा कि आज कोरोना आतंक के चलते ही रामायण धारावाहिक दिखाया जा रहा है। तब लोग अपनी इच्छा से देखते थे अब मजबूरी में देखते हैं। आज यह वायरस न होता तो सरकार रामायण धारावाहिक के बारे में विचार नहीं करती। आज की पीढ़ी और तब की पीढ़ी में जमीन-आसमान का अंतर है। सरकार को चाहिए कि वह आगे की सोचे न कि पीछे की। हम सबको पता है कि राम ने रावण का वध कर बुराई पर सच्चाई की विजय दिलाई। यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है। आजकी पीढ़ी सब कुछ जानती है। आज के एडवांस तकनीकी समय में यह सब फिजूल नहीं तो और क्या है?
पिता ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि तुम्हारी बात सही है। किंतु आज के एडवांस तकनीकी समय में हम कहाँ खड़े हैं इसके बारे में कभी सोचा है? नहीं। और सोचने का समय भी नहीं है। आज की पीढ़ी को यह जानना होगा कि भारत की संस्कृति महान क्यों है। उन्हें भारतीय विरासत के विचार, लोगों की जीवन शैली, मान्यताएँ, रीति-रिवाज़, मूल्य, आदतें, परवरिश, विनम्रता, ज्ञान आदि के बारे में जानना होगा। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है जहाँ लोग अपनी पुरानी मानवता की संस्कृति और परवरिश का अनुकरण करते हैं। संस्कृति दूसरों से व्यवहार करने का, सौम्यता से चीजों पर प्रतिक्रिया करने का, मूल्यों के प्रति हमारी समझ का, न्याय, सिद्धांत और मान्यताओं को मानने का एक तरीका है। पुरानी पीढ़ी के लोग अपनी संस्कृति और मान्यताओं को नयी पीढ़ी को सौंपते हैं। आज के समय की सबसे बड़ी विड़ंबना यह है कि मुश्किल से परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिल बैठकर अपनी बातें करते हैं। लॉकडाउन के बहाने ही सही परिवारे के सभी सदस्यों को एक-दूसरे बात करने का अवसर तो मिला। स्वभाव, विचार, परंपराओं की आस्था, दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरानी ओर नई पीढ़ी के संघर्ष का एक कारण आज का मानव-जीवन है। विज्ञान के साथ-साथ मनुष्य की गति दूर-दूर तक सम्भव हुई, किन्तु उसी अनुपात में उसका हृदय संकुचित और संकीर्ण बन गया। नाना तरह के कोरोना रूपी बीमारियों का आगमन भी हुआ। नई पीढ़ी की वृत्ति अपने आप तक सीमित होने लगी है, अपना सुख, अपना आराम, अपना लाभ। अपनेपन और अपने लाभ को प्रमुखता देने वालों के लिए असमर्थ, जराजीर्ण, अकर्मण्य, वृद्धजनों का पड़े-पड़े चारपाई तोड़ना अच्छा नहीं लगता। रोग-ग्रस्त, अन्धा, अपाहिज हो जाने पर तो वृद्ध-जनों का जीवन और भी कठिन हो जाता है। बेटे बहुओं द्वारा होने वाला तिरस्कार, निरादर कुछ कम कष्टकारक नहीं होता। उधर वृद्ध-जन भी मानसिक शिथिलतावश, चिड़चिड़ाहट युक्त आलोचना, यहाँ तक कि गाली-गालोच से पेश आते हैं। अधिकाँश घरों में यह संघर्ष चलता रहता है। वृद्ध-जन, पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ी के लिए सर दर्द बने हुए हैं, तो पुरानी पीढ़ी को जीवन निर्वाह की चिंता युक्त शिकायत है। यही वह समय है जब परिवार के सभी सदस्यों के बीच एक-दूसरे को समझने और संतुलन बनाने की आवश्यकता है। हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पुराने का त्याग इसलिए नहीं करना चाहिए कि वह पुराना है और नई चीज़ का स्वागत इसलिए नहीं करना चाहिए कि वह नया है। पुराने और नए के बीच जो अच्छा है, उसका स्वागत हमेशा करना चाहिए। हाथ में टच फोन बस स्टेटस के लिए अच्छा है, सब की टच में रहो ज़िन्दगी के लिए अच्छा है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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