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सामयिक व्यंग्य: अर्णब की गिरफ्तारी

भला भारत में ऐसे भी पूछ सकता है कोई..

देशहित सर्वोपरि। राष्ट्रहित सर्वोपरि। मुल्क का भला। आपका भला। उंगली उठाने वाले खबरदार..क्योंकि पूछता है भारत। नमस्कार दोस्तों ! मैं हूं आपका अर्णब गोस्वामी। और आप देख रहे हैं मेरे साथ ‘पूछता है भारत’ ।  देशवासियों, जो दिखता है क्या उसे देखना छोड़ दूं। जो आवाज चीख-चीख कर मुझे पुकारती है उसे सुन चीखना छोड़ दूं। अपने विचारों, अपनी भावनाओं की हत्या कर दूं। अपने कर्म, अपने मर्म की फिक्र करना छोड़ दूं। दोस्तों, मुझसे ये नहीं हो सकता। ये चैनल किसी के बाप का नहीं है। मेरा है। मेरा खून-पसीना है।जो चाहे वो करूं।  जरा सोचिए, आखिर वे मुझसे क्यों डरते हैं। क्यों..डरते हैं  मुझसे। क्या मुझसे दो-दो हाथ करने की उनमें हिम्मत नहीं । खुद को फौलाद की दीवार कहते हैं वो। तो महानुभावों, मेरा भी सिर कांच का नहीं है। जो हल्की सी चोट से तिड़क जाऊंगा। हिम्मत है तो आओ। आज पूरा देश तुम्हें देखना चाहता है। और पूछना चाहता है सारा भारत। क्यों कर रहे हो ऐसा। ये अर्णब गोस्वामी, ललकारता है तुम्हें। आओ, आ जाओ, आ भी जाओ यार। दिखा दो अपनी हिम्मत। क्या कहा। मेरा इलाज करोगे। अरे सुनो, हुक्म के गुलामों। लेमन ड्रिंक्स नहीं हूं मैं। जो झट से पी जाओगे। कॉटन कैंडी नहीं हूं, जो सटाक से गटक जाओगे। कुछ नहीं कर सकते मेरा। आजाद भारत की एक सौ बतीस करोड़ जनता साथ है मेरे। क्या कर लोगे। ओ भाई, कान खोल कर सुन लो। अर्णब दूध पीता लल्ला नहीं है। जो तुम्हारी एक गीदड़ भभकी से मां के आंचल में छुप जाएगा। और सुनो, हाथों में चूड़ियां नहीं पहन रखी। पास आकर तो देखो, कच्चा चबा जाऊंगा कच्चा। चप्पल चोरों चिंदी चोरों, फ्री की राजमा बिरयानी खाने वालों। पांच मिनट देता हूं। पांच मिनट। फिर न कहना। अर्णब गोस्वामी ने मौका नहीं दिया अपने आपको साबित करने का….।

चकरा गए ना। सोच रहे होंगे। दूसरों के दिमाग का दही बनाने वाले महानुभाव आज कैसी बहकी-बहकी बात कर रहें है। सुबह से आज सर मेरा भी चकरा रहा है।  जब से लाउडस्पीकरों को मात देने वाले, सरदर्द के साथ बदनदर्द करने वाले, आ बैल मुझे मार कहने वाले, महा ओजस्वी,महाऊर्जावान,देदीप्यमान,राजनीति के भावी उदीयमान सितारे, कॉमेडी पत्रकारिता में एकछत्र राज स्थापित करने वाले जनता के चहेते अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी की बात पता चली है, रोटी का एक कोर गले नहीं उतर रहा। वजह भी वाजिब है। जब तक रोज उसे एक घण्टे न सुन लें, नींद ही नहीं आती।

नाश जाए इस मुम्बई पुलिस का। भलेमानुष को भला कोई ऐसे गिरफ्तार करके ले जाया जाता है। वो कोई रणछोड़ थोड़े ही है जो मैदान छोड़ कर भाग जाए। उसे बताते तो सही कि हम तुम्हें गिरफ्तार करने आ रहे हैं। पगले की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। आवभगत में कोई कोरकसर नहीं छोड़ता। काजू कतली, बेसन बर्फी, बीकानेरी नमकीन कड़क कॉफी के साथ तैयार मिलती। चलो, मान लेते हैं। इस तरह की गिरफ्तारी में मेजबानी स्वीकार करना उचित नहीं था तो कम से कम उसे दो-तीन घण्टे का समय तो दे देते। जब तक वह सोच विचारकर  इस बारे में जिम्मेदारों को कोस तो पाता। आज का प्रोगाम ही रिकॉर्ड कर लेने लेते। मुद्दा तो वो अपने आप ही बना लेता। मौका तो देते एक बार। चुपके से ले गए हो। कोई गाजा बाजा लाते। बाहर हजारों लोग खड़े होने देते। अमिताभ बच्चन स्टाइल में खुद ही हथकड़ी लगवाने देते। फिर देखते उसकी टीआरपी के साथ मुंबई पुलिस की टीआरपी भी शिखर छू जाती।

    खैर अब ले ही गए हो तो देश की जनता के भावनार्थ एक लाइव प्रोग्राम वहीं से दिखवा देना। बड़े दिल का है वो। सारी व्यवस्था खुद ही कर लेगा। डिबेट में तुम्हे पक्का शामिल करेगा पर तुम्हें बोलने देगा या नहीं इस बात की गारंटी नहीं है। उसके पास जुझारू, कर्मठ निष्ठावान रिपोर्टर की फौज है। उन्हें भी तो काम चाहिए। उसे लाइव सुनने का मौका नसीब वालों को ही मिलता है। बस तुम उसे परमिशन दे देना। बाकी सब उसके भरोसे छोड़ देना। क्या कहा। प्लानिंग चल रही है। ठीक है तो बता देना। जनता जानना चाहती है कि पूछता है भारत से आप पूछेंगे या वो ही आवाज सुनाई पड़ेगी। पूछता है भारत। मेरे साथ आप भी इंतजार कीजिए। कुछ सूचना आई तो अगले अंक में आपको सुनाऊंगा पूछता है भारत का हाल।

सुशील कुमार ‘नवीन’

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