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सरकारी कोरोना प्रबंधन भोज!

घंटों बीत गए मूंदड़ा जी द्वारा निर्मित आईएसआई मार्का वीर रसात्मक दाल-बाटी खाए। इस अंतराल में जाने कितने लोगों ने कोरोना कालीन हवा-दवा आदि की घनघोर कालाबाजारी की। दाल-बाटी खाने का हादसा मेरी स्मृतियों में अभी तक अमिट है। मुझे मूंदड़ा जी ने बाटी भोज के लिए आमंत्रित किया था। बाटियों के पास में एक हथोड़ा रखा था। मैंने उनसे पूछा यह हथोड़ा किस लिए? मुझे कीलें कहां ठोकनी है? तब उन्होंने मेरा ज्ञान बढ़ाया- कीलें तुम्हारी खोपड़ी में ठोकनी है। तुम्हें मालूम नहीं है कि बाटियां सिर्फ हथौड़े से फोड़कर ही खाई जाती है? पहले हथोड़ा लो और बाटियां फोड़ लो। मैंने हथोड़ा लेकर बाटियों पे मारना शुरू किया। बाटियों ने हथौड़े से फूटने के लिए सख्त मना कर दिया। दरअसल वे लोहे के गोलों सी बनी थी। तब मैंने निवेदन किया कि एक घण (पत्थर तोड़ने वाला बड़ा भारी भरकम हथोड़ा) व मजदूर भी मंगवा लीजिए। पांच मजदूरों ने घण फटकारते हुए शीघ्र ही पांच घंटों में तीन बाटियों की खोपड़ियां उधेड़ दी। तीनों बाटियां थाली में सभी दिशाओं में क्षत-विक्षत हुई पड़ी थी। अब मूंदड़ा जी ने अध्यादेश जारी किया। पास में बड़ा भगोना पड़ा है। इससे दाल ले लीजिए। जैसे भ्रष्टाचार में कटमनी मिला दिया जाए वैसे ही दाल-बाटी मिलाकर खाने का एक अलग ही मजा है! मैंने अपनी जेब से सूक्ष्मदर्शी यंत्र निकाला और दाल को जांचा। उसमें दाल जैसी कुछ चीज दिखाई नहीं दी। फिर दूसरी जेब से दूरदर्शी यंत्र निकाला। लेकिन मुझे नतीजा शून्य मिला।
तब मैंने केंद्र सरकार से निवेदन किया कि वे इस प्रकरण की जांच कराएं। मुझे दाल का नियमानुसार आवंटन कराएं। सीन पर तुरंत ही सीबीआई प्रकट हुई। उसने नाना भांति के ऑफिसर बुलाए। दाल जंचवाई। उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। वे पतली गली से निकल लिए। तब रॉ के अत्यंत खूंखार खोजबीन अधिकारी आए। वे भी फेल! अंत में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तैराक बुलाए। उन्होंने दाल में जंप मार कर स्नान-ध्यान किया। तभी मूंदड़ा जी ने राज्यादेश जारी किया कि दाल बहुत ठंडी हो रही है और मुझे तुरंत ही यह अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू कर देना चाहिए। तब तक मुझे पता लग चुका था कि इस सर्वगुण संपन्न दाल में दाल के अलावा सभी गुण मौजूद हैं। मैंने जैसे ही दाल का लुफ्त उठाना शुरू किया मेरे नाक, कान, मुंह, आंख जैसे कई प्रदेशों से कई तरह के कीमती खनिज द्रव्य बाहर निकलने लगे। मेरे सामने कई तगड़े भू-माफिया खड़े थे। थोड़ी देर में ही ट्रक भर-भर कई तरह की फैक्ट्रियों में मेरे द्रव्य पहुंचाए जाने लगे। वे सारी फैक्ट्रियां मूंदड़ा जी की थी! बाटियां खाते-खाते ऐसे लगा जैसे पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ रहा हूं। दाल पीते-पीते आंसुओं की ऐसी धारा छूटी कि कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों की पेयजल समस्या समाधान के लिए मेरे आंसुओं के आगे अपने-अपने बांध बनाने लग गए। आंसुओं के आगे मेरी हालत ऐसी हो रही थी जैसे मेरे सामने ही मेरी प्रेमिका की शादी किसी और से कराई जा रही हो। पता है न! यह दाल-बाटी भोज वास्तव में सरकारी कोरोना प्रबंधन है!
रामविलास जांगिड़
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