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खुला पत्र अदृश्य कोरोना के नाम…!

हे कोरोना जी नमस्ते ! हम आपको डिटॉल से अपने हाथ साफ करने के बाद अपने सेनेटाइज हाथ जोड़कर दूर से ही विशालकाय नमस्ते फेंकते हैं जी। हमारी सनातन संस्कृति और परंपराओं का अक्षरशः पालन करते हुए यह खुला पत्र हम आपको ही लिख रहे हैं, क्योंकि अब हम मानवों में ( हम सभी में) सद् बुद्धि आ गई है। इस पत्र के जरिए हम हाथ जोड़कर आपसे निवेदन करते हैं कि अब आप इस धरती पर कदापि कदापि नहीं रहें, आप यहाँ से अपना रहवास छोड़कर हम सभी से
अर्थात् इस पृथ्वी से कहीं दूर,अत्यंत दूर चले जाएं। हम आपको जानकारी देना चाहते हैं कि हम अब पहले की तुलना में बहुत सुधर गए हैं और आपको देखकर हम अत्यंत साफ सफाई से रहने लगे हैं। हमारा लिविंंग स्टैंंडर्ड अत्यंंत सेनेटाइज युक्त हो गया है। जब से आप इस धरती पर आये हो तब से हमने अपने आप को, धरती के पूरे वातावरण को अच्छी तरह से सेनेटाइज करना सीख लिया है। हमें पता है कि आप धरती पर फैल रहे प्रदूषण, गंदगी से बहुत परेशान हो। हमने ही अपनी करतूतों से आपको परेशान किया है। हम प्रकृति के विरूद्ध क्या चलें, आपने इस धरती पर अवतार सवतार रौद्रवतार ले लिया। हमें पता है आप आदमी द्वारा फैलाए गये प्रदूषण से बहुत ही खफा है, दुखी हैं, क्रोधित हैं, तभी आपने अपना रौद्र रूप इस आदमी को दिखाया है। आपने हमें स्वयं को क्वॉरेंटाइन करना सिखाया, आपने हमें स्वयं को आइसोलेट करने की शिक्षा दी, आपने हमें सोशल डिस्टेंसिंग बनाये रखने की सलाह दी, इसके लिए हम आपके अहसानमंद है। हे कोरोना जी ! हम अब सरकार द्वारा और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी हरेक गाइडलाइंस का अक्षरशः पालन कर रहे हैं, हम किसी भी प्रकार की गलती के लिए आपके समक्ष सेनेटाइज किए हुए हाथ जोड़कर क्षमाप्रार्थी है। आपने हमें अपने अपने घरों में बंद रहने की सलाह दी है, उसे हम निभा रहे हैं और हम वादा करते हैं कि जब तक आप इस धरती से चले नहीं जाते तब तक हम अपने घरों से बाहर निकलने की हिमाकत नहीं करेंगे, बहुत ज्यादा जरूरत होने पर ही थोड़ा बहुत बाहर निकलेंगे। लेकिन कोरोना जी ,हम आपको यह कहना चाहते हैं कि हम कितना घर में रहें ? हम यह बात हिमाकत करते हुए बस आपसे पूछ रहे हैं ? क्योंकि घर में लुडो सांपसीढ़ी खेलकर, टीवी मोबाइल देखकर हमारे बच्चे थक गए हैं, मजदूर, मजदूरी के लिए नहीं जा पा रहे हैं, किसान, किसानी नहीं कर पा रहे हैं, आफिस वाले आफिस नहीं जा पा रहे हैं, बच्चों की शिक्षा दीक्षा यूं ही बीच में लटकी है, व्यापारी वर्ग का हाल बेहाल हो गया है, देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा बट्टा लग रहा है। अब हमने अपनी गलती सलती को मान लिया है, खुद को व वातावरण को साफ स्वच्छ और सेनेटाइज कर रहे हैं, साबुन से चालीस सैंकेंड क्या चार चार मिनट रगड़ रगड़ कर हाथ धो रहे हैं, बेचारा हमारा काला पीला हाथ भी अब चमकारे मारने लगा है, फिर भी आप यहाँ से जाने शाने को राजी ही नहीं है ? हम आपको देखकर अत्यंत ताज्जुब में है ? कोरोना जी ! आपको पता है किसी के साथ ज्यादा दिन रहने से उसकी कद्र घट जाती है। वो आपको पता होगा हमारे रामलुभाया जी की आदत है कि वो अपने ससुराल में जाकर कई कई दिनों तक बैठ जाते है ? कोरोना जी, आप ही बताएं इतने दिन कोई ससुराल में यूं ही बैठा रहेगा तो उसकी भला कोई कद्र करेगा ? आप रामलुभाया जी से थोड़ी सीख लें और यहां से इस धरती से चलें जाएं। अरे याद आया कोरोना जी पहले भी इस धरती पर तुम्हारे ही भाई बंधु आये थे वो क्या नाम है उनके ? हां याद आया प्लेग स्लेग, स्पेनिश फ्लू स्लू, कोलेरा सोलेरा। और अब है कि तुम आ गए ? कोरोना जी ये तुम्हारे भाई बंधु सौ सौ साल के अंतराल से आए थे और चले गये, तुम भी अपने भाई बंधुओं का अनुसरण करो और जल्द ही निकल जाओ यहां से। तुमने हमें साफ सफाई में पीएचडी थोड़े ही करवानी है, जो तुम यहाँ तक अभी भी रूके हुए हो ? तुमने लगभग लगभग इस धरती का विचरण कर लिया, और तुमने देखा होगा कि इस धरती का हरेक आदमी मास्क वास्क लगाकर अपने घरों में क्वॉरेंटाइन में है, आदमी ने अपने आप को लॉकडाउन कर लिया है और चौबीस घंटे में चौबीस सौ बार अपने हाथ पैर धोता है। कोरोना जी, हम तो आपसे बार बार यही कहेंगे कि अब बहुत हो गया, आप चले जाइए, इस धरती से। आज का इंसान तुमसे बहुत कुछ सीख गया है, देखो तुम भारत की इस धरती को ही देखो, सब के सब कैसे लॉकडाउन का अक्षरशः पालन कर रहे हैं। कोरोना जी यह आदमी आपको यकीन दिलाता है कि यह प्रकृति से कभी भी छेड़छाड़ नहीं करेगा।प्रकृति के हरेक नियमों का पालन करेगा। इधर उधर गंदगी नहीं फैलायेगा। नदियों, झीलों, पहाड़ों, झरनों, कुओं, बावड़ियों को सदैव साफ व स्वच्छ रखेगा। कूड़े करकट के ढ़ेर नहीं फैलायेगा, हवा, पानी, मिट्टी सभी को साफ रखेगा। प्रकृति की महत्ता और उसके महत्व को समझेगा। सार्वजनिक स्थानों स्टेशन, बस स्टैंड, पार्क सभी को साफ व स्वच्छ रखेगा। स्वच्छता के प्रति यह आदमी सदैव कृत संकल्पित रहेगा। कोरोना जी भारत ने तो स्वच्छता के लिए स्वच्छ भारत अभियान तुम्हारे आगमन से पहले ही चलाया हुआ है। तुम्हें पता है राष्ट्र पिता गांधी जी तो तुम्हारे आने से बहुत पहले ही स्वच्छता पर जोर देते रहे हैं। स्वच्छता तो इस देश की संस्कृति में है। यह देश तो वैसे भी शाकाहार का पालन करता रहा है और दूसरे देशों को भी सादा जीवन उच्च विचार की शिक्षा देता रहा है। इसलिए हे कोरोना जी हम भारत के लोग ही नहीं पूरे विश्व की तरफ से आपको विश्वास दिलाते हैं कि हम स्वच्छता, साफ सफाई का, सेनेटाइजेशन का सदैव ही ध्यान रखेंगे। तुम तो जानते हो कोरोना जी हम अब “इंसान” बन गये है, पिछले कुछ समय से हम इंसानों ने ही इस प्रकृति के साथ बहुत छेड़छाड़ की, इस पर खनन किया, संसाधनों का असीमित दोहन किया, प्रकृति के नियमों को तोड़कर उसका मजाक उड़ाया, कंक्रीट के ही कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिये,पशु पक्षियों के अधिवास छीन लिए, शाकाहारी से मांसाहार की ओर आवश्यकता से अधिक बढ़ गये। हम इंसानियत को भूल गये, इसका चोला हमने उतारकर फेंक दिया, लेकिन अब हम सभी अपने धर्म, अपने मजहब, अपनी जाति,अपने रंग आदि सभी को भूलकर केवल और केवल इंसान बन गये है। मैं यह समझता हूंं कि आपने हमें अपने किए कराये की अब तक खूब सजा दे दी है। हम आपसे साष्टांग निवेदन करते हैं कि आप जल्द से जल्द यहां से चले जाइए। गलतियां इंसान से ही होती हैं। हम भी आखिर इंसान हैं, आपने मानवजाति को अच्छा खासा सबक सिखा दिया है। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप जल्द ही पूरे विश्व से किसी अन्य ग्रह पर माइग्रेट करेंगे।आज आदमी लफंगा नहीं रहा है, उसे प्रकृति का मोल,उसकी कीमत क्या है, सब समझ आ गया है। आप जाइए, जरूर जाइए, यहां कदापि मत रहिए, यही हमारा निवेदन है क्योंकि हम प्रकृति के प्रति सभ्य, अति सभ्य और संस्कारी बन गए हैं। जय रामजी की।

धार्विक नमन, “शौर्य”,पटियाला, पंजाब।

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