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‘फॉरवर्ड’ करने की फूहड़ संस्कृति

समय के बदलते तकनीकी तेवर से सोशल मीडिया पर कोई भी चीज चंद सेकेंडों में वायरल हो जाती है। वायरल सामग्री अच्छी हो तो कोई बात नहीं। यदि वायरल सामग्री अश्लील तथा फूहड़ हो तो यह हमारे लिए अत्यंत घातक सिद्ध होती है। सोशल मीडिया पर बढ़ती हुई आपत्तिजनक पोस्ट्स के कारण हमारी भारतीय परम्पराओं और मूल्यों का पतन हो रहा है। नाम व पैसा कमाने के चक्कर में आज की पीढ़ी अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने की न्यूनतम सोच खो चुकी है। यह काफी महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारे समाज व संस्कृति को दूषित करने वाले ऐसे प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा न दिया जाए। आज कल टिकटॉक, लैकी, इंस्टाग्राम, हेलो जैसे प्लैटफॉर्म्स पर नकली और बदली हुई सामग्री परोसी जा रही है।
आज एप स्टोर पर ऐसे कई सारे एप आ गए हैं, जो आसानी से श्रव्य-दृश्य सामग्री को संपादित करने का विकल्प देते हैं। इसके साथ-साथ फूहड़ अथवा द्वंद्वार्थी गीतों की लंबी फेहरिस्त भी देखने को मिलती है। अधिकतर इन सामग्रियों को बनाने वाले युवावर्ग ही होते हैं। अब प्रश्न उठता है कि इन सबका दोषी कौन है? दिखाने वाला या देखने वाला। बात घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि मुर्गी पहले कि अंडा? वास्तव में देखा जाए तो हम सभी दोषी हैं! कारण, हम हर छोटी-सी-छोटी बात को फॉरवर्ड करने के लिए उसके सृजनात्मक पहलू को टटोलने के चक्कर में मार्फिंग (नकली) वीडियो और इमेज परोसने से नहीं चूकते। सभी को वायरल होने का भूत सवार है। इसलिए हम ऐसे वीडियो / संदेश सोशल मीडिया पर जारी करते रहते हैं! क्या ऐसा करने के लिए हमें दंडित नहीं करना चाहिए? कम से कम पश्चाताप करने की संभावना होनी चाहिए।
सामग्री में विविधता तथा स्वयं को दूसरों से अलग दिखाने के चक्कर में लोग जोखिम भरे स्टंट करते हैं। इसमें सफल होने की संभावना कम और हाथ-पैर तुड़वाने की संभावना अधिक होती है। आयु सीमा की परवाह किए बिना छोटे-छोटे बच्चे ऐसे-ऐसे कारनामे करते हैं कि दांतों तले उंगली दबा लेनी पड़ती है। इसे प्रोत्साहन देने वाले कई साहसिक धारावाहिकों के चैनल मोटी रकम भी कमा रहे हैं। सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक और भीतर से लेकर बाहर तक के ऐसे-ऐसे दृश्य होते हैं जिन्हें देखने पर लाज आती है। अधिकांश वीडियो तथा चित्र इस तरह रोजमर्रा की गतविधियों को अनोखे ढंग से उजागर करने के प्रयास में रहते हैं। यही आगे चलकर समाज के उपहास का कारण बनते हैं।
अब ऐसे सामाजिक उपहास की हमारी सहनशीलता बढ़ रही है। बड़ी समस्या यह है कि हमारा मानना है कि यह एक मजाक है। मनुष्य का मस्तिष्क स्वयं को धोखा देने की क्षमता रखता है। यह इस नकली प्रवृत्ति की एक स्वीकार्यता है। हास्य की भी एक सीमा होती है। हास्य सहानुभूति/करुणा/साहचर्य की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। किंतु नकलीपन में ऐसे मूल्यों का पतन होता जा रहा है। लोग आपसे कुछ इस तरह से व्यवहार करेंगे कि वह आपके सुख-दुख में भागीदार हैं, जबकि व्यवहार इसके विपरीत करते हैं। यह एक प्रकार की क्रूरता है जिसमें दूसरों के दुख से हमें सुख मिलता है।
दुर्भाग्य देखिए कि हम इस अंतर से अनभिज्ञ हैं। यह सबूत है कि हम सामाजिक रूप से दरकिनार होते जा रहे हैं। वे लोग जो सुबह गुड मॉर्निंग या सुप्रभात के साथ प्रेरक संदेश भेजते हैं, वे ही दुखी वीडियो को दोपहर में दूसरों के साथ साझा करते हैं। हममें से जो लोग मनोरंजन, व्यंग्य, विडंबना, हास्य, मज़ाक, गाली, और उपहास के बीच अंतर नहीं जानते हैं, वे एक दूसरे के दुख के प्रति सचेत नहीं रहते हैं। हमें इन स्थितियों को विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है। कुछ बोलने या लिखने से पहले हमें यह कई बार सोचना चाहिए कि क्या इस रचना से किसी को पीड़ा हो सकती है? क्या इसे साझा करने के परिणामस्वरूप किसी को चोट पहुँच सकती है? यदि हम इतना मात्र सोचकर अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएँ तो अवश्य समाज आहत नहीं होगा। बिना सोचे-समझे कोई भी वीडियो, कोई भी चित्र समय-बेसमय दूसरों को भेज देते हैं। आजकल यह बिना सोचे-समझे फॉरवर्ड करने का कल्चर हमारे समाज में महामारी के रूप में फैल रहा है।
क्या यह महामारी हमेशा के लिए है? यह संक्रामक कैसे बना? इसका स्रोत कहां है? मेरी राय में, इसकी उत्पत्ति ‘रोस्ट’ संस्कृति में निहित है। रोस्ट का अर्थ है- जलना या जलाना। दूसरे शब्दों में इसका प्रयोग किसी और को फटकार के साथ जलाने के लिए किया जाता है। अमेरिका और यूरोप के ‘स्टैंडअप कॉमेडी’ से शुरू हुई ऐसी रोस्ट परंपरा का उद्देश्य राजनेताओं और मशहूर हस्तियों की चुटकी लेना था। जब सोशल मीडिया पर मजाक का विस्तार हुआ, तो ज्यादातर लोग इन ‘चुटकियों’ को नहीं समझ पाए। हमारे यहाँ चुटकियों के नाम पर हास्य की फूहड़ता परोसी गई। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि चुटकी लेने के चक्कर में खराब गुणवत्ता वाले अथवा सार्वभौमिक तिरस्कार वाले वीडियो बनाए गए। चीन इस मामले में एक कदम आगे था। चूंकि दुनिया भर में अंग्रेजी अथवा अन्य भाषाओं में ऐसे वीडियो बनाना कठिन कार्य था, ऐसी स्थिति में चुटकियों का बाजारीकरण के उद्देश्य से चीन ने अपना दमखम लगा दिया। यही कारण है कि आज जितने भी फूहड़-अश्लीलता परोसने वाले एप हैं, वे अधिकतर चीनी बाजार की देन है। चीनी बाजार ने सोशल मीडिया के लिए ऐसे-ऐसे एप बनाए कि उसके लिए भाषा की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इन एपों में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री मूल वस्तुओं की नकल भर होती है।
चीन ने बाजारीकरण के माध्यम से हमारे युवाओं को दिगभ्रमित किया है। दूसरों शब्दों में कहें तो शिकारी के जाल में शिकार खुद फँस गया है! भारत में यह स्थिति दूसरे देशों की तुलना में अधिक सफल रहा। आज युवा पीढ़ी टिकटॉक, हेलो, लैकी, डबमैश एपों के नाम पर दिन के आठ-आठ घंटे इन पर विकृत वीडियो देखते रहते हैं। कुछ तो एक कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने अपने दम पर खुद के वीडियो फिल्माना शुरू कर दिया है। उनके ऐसा करने से हमें दिक्कत नहीं है। दुख इस बात का है कि इसमें फूहड़ता-अश्लीलता, भड़काऊ भाषणों, आपत्तिजनक दृश्यों, जुगुप्सा, भीभत्स तथा कामुकता वाले पुट अधिक है, जिसे कई लोग बिना सोचे-समझे ‘फॉरवर्ड’ करते जा रहे हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
https://hi.wikipedia.org/s/glu8

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