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भारतीय वातावरण में व्याप्त विषैले वायु प्रदूषक ‘पीएएच’ दूर करने में प्लाज़्माक्लस्टर आयन है असरदार

भारतीय वातावरण में व्याप्त विषैले वायु प्रदूषक ‘पीएएच’ दूर करने में प्लाज़्माक्लस्टर आयन तकनीक के असरदार होने की पुष्टि
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी, दिल्ली) के सहयोग से की गई पुष्टि

विजय न्यूज ब्यूरो

(From L – R) Hisaharu Yagi, Sharp Corporation, Japan, Shinji Minatogawa, Sharp Business Systems (India) Pvt. Ltd & Dr. Sagni,k Dey, Associate Professor, IIT Delhi

शार्प काॅर्पोरेशन ने आईआईटी दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर – डाॅ. सागनीक डे और डाॅ. गज़ाला हबीब के सहयोग से यह प्रदर्शित किया है कि भारतीय वातावरण में मौजूद विषैले वायु प्रदूषक पीएएच (पाॅलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन) दूर करने में प्लाज़्माक्लस्टर आयन तकनीक वाकई असरदार है। भरतीय शहरों में इन प्रदूषकों का भारी प्रकोप देखा गया है। प्रोजेक्ट की शुरुआत 2018 में की गई। दिल्ली-एनसीआर (भारत) के वायु प्रदूषकों में प्रदूषक कणों के कम्पोजिशन की माप के साथ शुरू इस प्रोजेक्ट के तहत कई प्रकार के प्रदूषकों की पहचान की गई जिनमें पीएएच भी शामिल थे जो मनुष्य के लिए विषैले माने जाते हैं।
इन परिणामों के मद्देनजर आईआईटी दिल्ली और शार्प ने प्लाज़्माक्लस्टर का असर परीक्षण के लिए तीन तरह के पीएएच चुने। परिणामों से यह सामने आया कि प्लाज़्माक्लस्टर के उपयोग से 91.1 प्रतिशत फ्लूरेंथीन, 62.1 प्रतिशत क्राइसीन और 94.6 प्रतिशत डाइबेंज़ो (ए, एच) एंथ्रासीन प्रभावी तरीके से दूर हो गए।
प्लाज़्माक्लस्टर आयन अभूतपूर्व शुद्धिकरण तकनीक है जिससे पाॅजिटिव आयन ख्भ़्;भ्2वद्ध द,, और निगेटिव आयन ख्व्2.;भ्2वद्धउ, एक साथ हवा में रिलीज किए जाते हैं।

Mr. Shinji Minatogawa, Managing Director, Sharp Business Systems (India) Pvt. Ltd speaking at the event announcing PCI technology certification by IIT Delhi

पाॅजिटिव और निगेटिव आयन तुरंत हवा में मौजूद प्रदूषकों जैसे कि बैक्टीरिया, वायरस और कैमिकल कम्पाउंड की सतह पर दुबारा जुड़ कर हाइड्राॅक्सिल रेडिकल (ओएच) बनाते हैं जिनमें अत्यधिक आॅक्सीडेशन की क्षमता होती है और यह रसायनिक प्रतिक्रिया सेल्युलर कम्पाउंड या रसायनिक संरचना को डिकम्पोज (अपघटित) कर उनका विषैलापन दूर कर देती है। शार्प इस तथ्य का लाभ लेती है कि आयन का कंसंट्रेशन अधिक होने से वायु प्रदूषकों को डिकम्पोज करने की क्षमता बढ़ जाती है। शाॅर्प अस्पताल, कार्यालय, सार्वजनिक स्थानों आदि अन्य परिवेशों में इस तकनीकी के संभावित उपयोग की दूरदृष्टि रखती है। शार्प स्वास्थ्य क्षेत्र में सामाजिक योगदान जारी रखते हुए पीसीआई तकनीक को अधिक उन्नत बनाने और इसके असर को प्रदर्शित करने के प्रयास जारी रखेगी ताकि हमारी जिन्दगी से विभिन्न प्रदूषक तत्व दूर हो जाएं।

1 प्लाज़्माक्लस्टर और प्लाज़्माक्लस्टर आयन शाॅर्प काॅर्पोरेशन के ट्रेडमार्क हैं

एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. गजाला हबीब ने बताया
परीक्षण परिणामों से जाहिर है कि पीसीआई तकनीक कैंसरकारक पीएएच को डिकम्पोज और कम करने में असरदार है। ये प्रदूषक कण सांस के साथ अंदर पहंुच जाते हैं। उम्मीद है कि पीसीआई तकनीक के उपयोग से चारदीवारी के अंदर की हवा में सुधार होगा और पूरी दुनिया मेें इसके उपयोग करने वालों की ज़िन्दगी अधिक स्वस्थ होगी।

एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सागनीक डे ने बताया
वायु प्रदूषण भारत के स्वास्थ्य संबंधी खतरों में एक है। नीति बना कर प्रदूषण कम करने में ज्यादा समय लगेगा पर एयर प्युरीफायर निजी सुरक्षा के असरदार साधन बन कर सामने आए हैं। शाॅर्प की पीसीआई तकनीक ने व्यावहारिक रूप से साबित कर दिया है कि यह विषैली हवा में मौजूद पीएएच कणों को दूर कर देगी।

पीएएच के बारे में
पाॅलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) ऐसे जैव कम्पाउंडों का समूह है जिनमें दो या अधिक एरोमैटिक रिंग मिले होते हैं। पीएएच में 100 से ज्यादा कैमिकल हैं और ये भारत में अन्य हाइड्रोकार्बन के साथ-साथ प्रमुख वायु विषैले-प्रदूषकों में शामिल हैं। पीएएच कई एंथ्र्र्र्र्र्रोपोजेनिक गतिविधियों के साथ डीजल इंजन में ईंधन के अधूरे दहन की वजह से पैदा होते हैं। कुछ पीएएच कैंसरकारक और म्युटाजीनिक हैं और कुछ मनुष्य में क्राॅनिक बीमारियां पैदा करते हैं। इस बार जिन 3 पीएएच के परीक्षण किए गए उनके दिल्ली के परिवेश में मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है और क्राइसीन एवं डाइबेंज़ो (ए, एच) एंथ्रासीन कैंसरकारक माना जाता है।

Dr. Sagnik Dey, Associate Professor, IIT Delhi speaking at the event announcing PCI technology certification by IIT Delhi (2)

वायु प्रदूषक ‘‘पीएएच’’ पर प्लाज़्माक्लस्टर का प्रभाव जांचने की पद्धति
3 किस्म के पीएएच की लगभग ‘सब-एनएम’ रेंज़ की बहुत बारीक परत प्रत्येक ग्लास पैट्रीडिश में अलग-अलग बनाई गई। प्रत्येक सैम्पल 4 एल बाॅक्स के अंदर 1 सैम्पल के लिए डाला गया। बाॅक्स 2 तरह के थे। एक में प्लाज्माक्लस्टर आयन (पीसीआई) जेनरेटर (पीसीआई आॅन) और दूसरा बिना प्लाज्माक्लस्टर (पीसीआई आॅफ) था। पीसीआई आॅन बाॅक्स के अंदर परीक्षण के दौरान लगभग 1,000,000 आयन/ सेमी 3 का आयन कंसंट्रेशन कायम रखा गया जिसके संपर्क में सैम्पल रखे गए। पीसीआई से संपर्क के बाद सैम्पल एकत्र किए गए और बाकी पीएएच की माप जीसी-एमएस (गैस क्रोमाटोग्राफी मास स्पेक्ट्रोस्कोपी एनालिसस) से की गई। परिणामों से यह सामने आया कि टेस्ट बाॅक्स के अंदर लगभग 1,000,000 आयन/ सेमी 3 के आयन कंसंट्रेशन के साथ 10 दिनों तक प्लाज्माक्लस्टर आयन के संपर्क में रहने के बाद पीएएच कंसंट्रेशन में बड़ी कमी आई। असर 91.1 प्रतिशत फ्लूरेंथीन, 62.1 प्रतिशत क्राइसीन और 94.6 प्रतिशत डाइबेंज़ो (ए, एच) एंथ्रासीन में कमी के रूप में देखी गई।

आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं का परिचय

  • डाॅ. सागनीक डे: एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी दिल्ली
  • डाॅ. गजाला हबीब: एसोसिएट प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग, आईआईटी दिल्ली
  • डाॅ. बिपाशा घोष: पोस्ट डाॅक्टोरल फेलो
  • डाॅ. हिमांशु लाल: पोस्ट डाॅक्टोरल फेलो
  • नासीर बेग: प्रोजेक्ट साइंटिस्ट

आईआईटी दिल्ली का परिचय

  • 1961 में स्थापित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली एक सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान है जो नई दिल्ली (भारत) में है।
  • प्रौद्योगिकी संस्थान संशोघन अधिनियम, 1963 के तहत इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया।
  • 2018 में इसे विशिष्ट संस्थान का दर्जा दिया गया।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आईआईटी दिल्ली का क्यूएस वल्र्ड युनिवर्सीटी रैंकिंग में 182वां स्थान है। इसी रैंकिंग में इसे 2019 में एशिया के अंदर 40 वां स्थान दिया गया और 2019 में ब्रिक्स देशों में 18 वां स्थान मिला।

प्लाज्मा आयन टेक्नोलाॅजी का परिदृश्य

प्लाज्माक्लस्टर आयन जेनरेशन इलैक्ट्रोड पर पाॅजिटिव और निगेटिव वोल्टेज़ देने से हवा में मौजूद पानी एवं आॅक्सीजन के मोलेक्यू प्लाज्मा द्वारा डिकम्पोज और आयनीकृत हो जाते हैं। इस तरह पाॅजिटिव हाइड्रोजन आयन (भ़्) और निगेटिव आॅक्सीजन आयन (व्.) जेनरेट और हवा में रिलीज होते हैं। हवा में पानी के मोलेक्यूल अंगूर के गुच्छों की तरह आयन के चारों ओर क्लस्टर बनाते हैं। प्रत्येक आयन एक स्थिर ‘अंगूर के गुच्छों’ का हिस्सा या आयन क्लस्टर तैयार करता है।

प्लाज्माक्लस्टर में इन्फ्लुएंजा वायरस दूर करने का मैकेनिज्म

  • हवा में मौजूद वायरस की सतह को पाॅजिटिव और निगेटिव आयन घेर लेते हैं।
  • रसायनिक प्रतिक्रिया सतह के प्रोटीन को तोड़ देती है और वायरस को अक्रिय कर देती है।
  • इन्फ्लुएंजा वायरस अक्रिय करना
    (आचेन युनिवर्सीटी आॅफ एप्लाइड साइंसेज़, जर्मनी के प्रोफेसर डाॅ. गरहर्ड आर्टमन के सहयोग से साझा शोध से प्राप्त जानकारी)
  • वायरस की सतह पर होने वाली रसायनिक प्रतिक्रिया से पाॅजिटिव और निगेटिव आयन रीएक्टिव ओएच रेडिकल में बदल दिए जाते हैं।
  • ओएच रेडिकल सतह पर स्पाइक प्रोटीन से हाइड्रोजन एटम को हटाने के बाद उन्हें अक्रिय कर देते हैं। जब एक ओएच रेडिकल एक हाइड्रोजन एटम हासिल करता है तो यह पानी (भ्2व्) बनाता है।
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