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कविता : एक शिकारी

आज हवा में जोर है
हर ओर है
नफ़रत और द्वेष का
एक जिद्दी शिकारी पाल
रखा है सपना
जलाने को जंगल जहाँ था मंगल
अपने कुछ अनुयायी से साथ
जिनका नाता नही है ज्ञान से विज्ञान से
जला रहा है नव पुष्पित फूल और वृक्ष को
भाईचारे से जी रहे जानवरों को
उसे पता है बड़े होकर बिखेरेंगे
छाया और सुगन्ध
पर उसकी जिद्द जो न कराये
कही ऑस्ट्रेलिया का जंगल
किसी जिद्दी का शिकार तो नहीं
जिसने तबाह कर दिया करोड़ो जीवन को
राख की मूर्तियां बन गए जानवर
तबाह हो गए लाखों नस्ल
देश भी है जिद्दी के हाथों में
विचारों की लड़ाई अब
डंडे और लोहे के सरियों से
हो रहा है दमन विचारों का
भौंक रहे है चारों ओर पालतू
जला रहे हैं ज्ञान विज्ञान के मंदिर को
कहीं ऐसा न हो राख के अवशेष बच जाएं
इन मंदिरों में और हम बजाते रहें
तालियाँ शिकारी के इशारे पर
भक्ति हमेशा से कष्टदाई रही है
इतिहास गवाह है
अभी भी वक़्त है! बच के निकलो
इस जिद्दी शिकारी के चुंगल से
वरना विनाश तो सुनिश्चित है!!!

डॉ मनोज कुमार

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