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कविता : एक चिंतन

आजाद देश गुलाम जनता
लाचार बेबस
हर बार इस इंतजार में
अच्छे दिन आयेंगे!
एक आशा की किरण के साथ
जाता है चुनाव बूथ पर
और डाल देता है अपना मत
आक्रोश के साथ
क्या करे बेचारा?
एक ओर है कुँआ
तो दूसरी ओर खाई
दोनों में बैठे है जोंक
जो पी कर खून जनता का
करते है अय्याशी
और समझते हैं
अपना हक हर वक़्त
पिला देते जनता को
धर्म का चरस
जाति का अफ़ीम
इधर नशे में मदहोश जनता
उधर होता रहता है उनका
आर्थिक और मानसिक शोषण
क्या यही आजादी है?
तो लानत है इस आजादी पर
हमें इंसान होने का ?
इससे तो अच्छा तो
हम जानवर ही होते
ना वहाँ जाति है न धर्म
ना ऊँच न नीच
तो क्या जरूरत है?
एक और आंदोलन की
जो दिला सके आर्थिक और मानसिक गुलामी से आजादी या
बैठे रहे हाथों पर रख हाथ
किसी बाबा के चमत्कार के इंतजार में
जो करता है चमत्कार के नाम पर
शारीरिक शोषण
जिसको है सबका संरक्षण
फिर क्या करना है ?
वक़्त कम है समय के साथ
जरूरी है चिंतन
अभी नहीं तो कभी नहीं
जागना होगा सबको अभी आज
इसी वक्त आओ मिल के करे
एक शुरुआत

डॉ मनोज कुमार

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