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कविता : नया गीत हो एक

नया है जमाना , नयी रीत हो एक
नया हो तराना , नया गीत हो एक
खुद से ही खुद का जरा सामना हो
खुद के ही हाथों को खुद थामना हो
खुद को जो जानें हम और बेहतर
नयें भाव पनपें, नयी भावना हो
दिल में बसी बस नयी प्रीत हो एक
नया हो तराना , नया गीत हो एक
प्रेम के अलावे न कुछ और आए
अलावे न दिल के कोई ठौर आए
सबके दिलों में बसी हो मोहब्बत
कभी भी न नफरत का दौर आए
नफरत को हराकर के जीत हो एक
नया हो तराना , नया गीत हो एक

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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