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कविता : नदी बन जाऊं

अपने प्यारे भारत देश में,
मैं लगातार आगे बढ़ता जाऊं।
जी करता है मैं भी नदी बन जाऊं।

अपने संग सब को लेकर,
उन्हें उनकी अपनी मंजिल बताएं,
नदियों सा आगे ही आगे बढ़ते जाएं।

वंचित पीड़ित दीन दुखियों में,
शैक्षिक चेतना का मैं संचार करूं,
शिक्षा दे अशिक्षा का वैतरणी पार करूं।

कभी उछलूं कभी उथला बनूं,
कभी कभी मैं तूफान बन जाऊं,
समाज की गंदगियों को बहा ले जाऊं।

आगे बढ़कर समुद्र से मिलकर,
जिंदगी रूपी सागर की गहराई छू लूं,
जी करता है मैं नदी के जैसा बहता चलूं।

गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम
देवदत्तपुर दाऊदनगर औरंगाबाद बिहार- ८२४११३
फोन ९५०७३४१४३३

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