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कविता : थोड़ा बदल जाइए

अपना काम निकालने को अपने
चेहरे पर इतने मुखोटे न लगाइए।

इतना अपनापन मत जताइए
नया ज़ख़्म देके न जाइए।

भरोसा दिखाइए पर इसमें
जूठी कसमे मत खाइए।

भटके हुए राही को
सही रास्ता तो बताइए।

फासला बहुत है दिलों के बीच
प्यार से दीवार तो हटाइए।

इल्जाम औरों पे लगाने से पहले
खुद के दामन से दाग धुलाइये।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज,4 नवखुनिया
गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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