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कविता : नया जहां बनाये

नया जहां बनाये फिर से
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाएं फिर से
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाये फिर से

न कोई उम्मीद हमसे
दिलनवाज़ी तोहमत हमसे
देखो सही नज़रों से
प्यार बढ़ाओ मेरी बातों से
न ज़ाहिर करो लब से
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाएं फिर से।

न कोई उलझन हम से
मुझे भी लोग कहते हैं
कि ये जलवे पराए हैं
रातों के साये हैं तब से
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाएं फिर से।

जब कोई गिला हो हमसे
उसको भूलना मन से
खत्म हो दूरियां दिल से
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाएं फिर से।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज,4 नवखुनिया,गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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