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कविता : बगीचा की देन

बगीचा की देन


बाग-बगीचा,
अनुपम उपहार।
इनके बदौलत,
दुनिया-संसार।
पेड़-पौधा लगाएं,
जहां धरा खाली।
बागीचा से जग में,
रहती है हरियाली।
जहां सघन है,
बगीचा आवरण।
वहां पर मिलता,
स्वच्छ पर्यावरण।
बाग-बगीचा,
मिले जहां-जहां।
वहां का रहता,
शुद्ध आबो हवा।
बागीचा से मिलता,
फल-फूल,जलावन।
पत्ते भी काम आते,
दिन हो जब पावन।
घर में जो पलंग-कुर्सी,
और दरवाजा खिड़की।
स्कूल में जो टेबल-बेंच हैं,
वह भी बागीचा की देन है।

गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम
औरंगाबाद बिहार

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