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कविता : हरियाणवी गीतिका

चीचड़ ज्यों तोड़ बगावै,प्यार कुणसा तेरा सै।
जिंदगी में रोवण खातर,एको दुःख भतेरा सै।।
म्हारे धोरे यार अमानत सारी इस खुदा की सै।
खामखा ना एंडी पाक्ये,कुछ ना तेरा मेरा सै।।
दिन ढलत्ये रात हो,छोटी बड्डी हो जाया करये।
पाकी बात समझ बावले,होव जरूर सबेरा सै।।
झूठ-झाठ छोड़ झकोई साची बात प्ये आज्या।
माणस इब रहा नहीं,बणा चीता शेर बघेरा सै।।
बेशक हो ढोल बाजता,इसमें कोन्या रोल कती।
लट्टू चसदा बाहर चये,पर भीतर घोर अँधेरा सै।।

कृष्ण कुमार निर्माण

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